क्या ख़ाक लगा पायेगा

मेरी कैफ़ियत का अंदाज़ा
तू क्या ख़ाक लगा पायेगा,
जिसने दिल न लगाया हो कभी
वो खुदा कहाँ से पायेगा,

हमने तो इश्क़ की राहों में
ज़िन्दगी का नूर ही पाया,
तू मंजिल पाकर भी रहेगा तन्हा
गर मोहब्बत का सबक न सीख पाया,

हमने तो हर मसले का हल
मुस्कुराकर ही निकाला है,
ख़ुदा मालिक है दुनिया का
और 'इश्क़' ख़ुदा से भी आला है,

मिटटी के जिस्म का क्या करता
मैं खुश हूँ तेरे अक्स को पाकर,
अब ग़म नहीं तेरी ग़ैर-मौजूदगी का
तेरा अक्स मिलता है मुझे ख़्वाबों में आकर !

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