कुछ दिन तो गुजारिए रण उत्सव के शामियानों में!

भारत - जितनी सदियां उससे अधिक इसके नाम, जितनी नदियां उससे कहीं अधिक विशाल इसका जन - जीवन, और जितनी भाषा उतने वेश। आखिर कविवर रविंद्रनाथ टैगोर ने इसे यूं ही महामानवों का समुद्र नहीं कहा है। भारत उस समुद्र की ही तरह है जिसमें विभिन्न भाषाओं को मानने वाले लोग रहा करते हैं यहां लगभग हर 50 किलोमीटर के दायरे में लोगों का रहन - सहन, बोलियां बदल जाया करती हैं। विविधता से भरे ऐसे ही देश में संस्कृति, उल्लास, आधुनिकता और परंपरार का समागम होता है। जी हां, यह सब नजर आता है गुजरात में।

गुजरात

गुजरात, आप सोच रहे होंगे कि यहां पर हमने गुजरात का उल्लेख क्यूं किया। अजी जब रण उत्सव की बात हो रही हो तो फिर गुजरात का नाम क्यूं न लिया जाए। वह गुजरात जो चनिया - चोली, गरबों, दाभेली और सूरत के रेडिमेड गारमेंट्स के लिए जाना जाता हो वह अब एक और  वजह से जाना जाने लगा है। जरा सोचिए कि क्या है वह वजह।

सोचिए, अजी गच्चा खा गए जनाब। वह वजह है नरेंद्र। नरेंद्र! जी हां, नरेंद्र दामोदर दास मोदी। जिसके नेतृत्व में गुजरात वायब्रेंट गुजरात हुआ और अब भारत डिजीटल हो रहा है। कुछ भी हो आप यही कहेंगे कि मेरा देश मोदी के नेतृत्व में बढ़ रहा है। यहां हम ऐसे गुजरात की बात कर रहे हैं जो कि अपने आप में अलग है जो कि संस्कृति की एक झलक लेते हुए आधुतिनकता की ओर बढ़ रहा है।

यहां हम बात कर रहे हैं कच्छ में मनाए जाने वाले रण उत्सव की। अब जरा कच्छ के रण पर नजर दौड़ाई जाए। आखिर यह इतना विशेष और अलहदा क्यूं है कभी आपने विचार किया है। जी हां, तो अब हम आपको बताते हैं कच्छ के रण के बारे में। आपने रेगिस्तान के दर्शन तो कई बार किए होंगे।

राजस्थान जाने का मौका आपको जरूर मिला होगा। यहां दूर - दूर तक रेत ही रेत और कुछ कंटीले पौधे आपको नजर आते होंगे। मगर जब कच्छ के रण की बात आती है तो आप पाऐंगे कि यहां दूर - दूर तक सफेदी नज़र आती है। ऐसा लगता है कि जैसे यहां सफेद चादर सी बिछी हुई है। आखिर यह क्यूं है। क्या आपने इस बारे में कभी सोचा है। ऐसा यहां पर नमक के घुले होने के कारण है।

कच्छ का रण

आमतौर पर तो कच्छ के रण को विश्व के महत्वपूर्ण रण क्षेत्र के तौर पर जाना जाता है यहां हर समय भारत के सीमा प्रहरियों के पैरों के निशानों की मौजूदगी देखने को मिलती है। मगर जब रणउत्सव की बात हो तो माहौल कुछ अलग हो जाता है। आप यह सोच रहे होंगे कि रणोत्सव में तो युद्धक टैंक, युद्धक हथियारों और जवानों के युद्ध कौशल का प्रदर्शन होता है। मगर यहीं आप गलती कर रहे हैं। इस क्षेत्र को स्वामी विवेकानंद के लिए भी जाना जाता है माना जाता है कि स्वामी विवेकानंद ने यहां की यात्रा की थी।

रणोत्सव

रणोत्सव तो उत्सव है संस्कृति का, यह उत्सव है मानव की परंपराओं का। यह उत्सव है मानव के सौहार्दपूर्ण और उल्लासित वातावरण में जीने का। दरअसल उत्तरी गुजारत के कच्छ में कच्छ कार्निवाल मनाया जाता है। इसे ही रण उत्सव कहा जाता है। अरब सागर से घिरे इस क्षेत्र में धोरडो गांव में एक सांस्कृतिक ग्राम तैयार हो जाता है और फिर बिखर जाती है एक शानदार उत्सवी माहौल की छटा। सच पूछिए तो रणोत्सव में गुजरात ही नहीं भारत के पर्यटन का आकर्षण छुपा है। इस उत्सव में नमक घुली धरती से काठियावाड़ी और गुजराती संस्कृति की सौंधी खुशबू फिजा में घुल जाती है। जानकारी के अनुसार इस बार यह उत्सव 1 नवबर 2016 से 20 फरवरी 2017 तक मनाया जा रहा है।

ओल्ड इज गोल्ड

यहां आने वालों को बांस - मिट्टी के विशेष प्रयोग से बने काॅटेज में ठहरने का अवसर मिलता है। इस उत्सव में लोगों को एक ऐसे गांव का माहौल मिलता है जो आज भी भारत की संस्कृति से जुड़ा हो। इन काॅटेजेस की दीवारों पर आकर्षक चित्रकारी नजर आती है। तो गुजराती साफे, काठियावाड़ी पगड़ी और धोती - कुर्ता पहने लोग यहां आने वालों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इस उत्सव में महिलाऐं चनिया चोली और लकड़ी व अन्य सामान से बने आभूषणों को पहनकर परिचय देती हैं और यह दर्शाती हैं कि भले ही फैंसी ज्वेलरी का जमाना हो लेकिन फिर भी ओल्ड इज गोल्ड ही है।

जुगाड़ का तिगाड़

इस रण उत्सव में लोगों को राजस्थान में परिवहन के लिए अपनाए जाने वाले विशेष वाहन जुगाड़ जैसे वाहन की सवारी का आनंद मिलता है। आप शायद सोच में पड़ गए होंगे कि आखिर ये जुगाड़ क्या है। भई जुगाड़ एक देशी शब्द है। नोटबंदी के इस दौर में इसकी बड़ी डिमांड है। बहरहाल राजस्थान में एक विशेष वाहन चलाया जाता है। जिसमें वाहन का अगला भाग मोटरसाईकिल की तरह नजर आता है और पीछे के भाग को आॅटो, या दूसरे वाहन की तरह शक्ल दी जाती है। इसमें सवारी बैठाने का कार्य किया जाता है।

यह तीन पहिया वाहन मरूस्थलीय क्षेत्रों में अधिक देखा जाता है। कुछ ऐसे ही वाहन की सवारी का आनंद रणोत्सव में आने वाले यात्रियों को मिलता है। हम यहां पर इस वाहन का नाम बता देंगे तो सारा सस्पेंस ही खत्म हो जाएगा। हां यहां पर ऊंटों की सवारी भी करवाई जाती है। इसलिए रण उत्सव की तैयारी कीजिए और वहीं जाकर इन सवारियों का आनंद लीजिए। वाकई में संस्कृति, आधुनिकता और जुगाड़ का तिगाड़ बड़ा निराला है।

राजसी विलास

ऐसा नहीं है कि रणोत्सव में आपको केवल परंपरागत सभ्यता का ही परिचय मिता है। शामियानों से महल की तरह सजाए गए भव्य परिसरों में आपको सौराष्ट्र और गुजरात के अन्य क्षेत्रों के राजसी विलास का परिचय मिलता है। इसके इतर यहां रणोत्सव में आने वाले लोग आधुनिक तरह से आसमान में पंछियों की तरह उड़ने का स्वप्न पूरा कर लेते हैं।

दरअसल यहां पर ठेठ देशी अंदाज में लोग उत्सवी आनंद मनाते हें तो दूसरी ओर आधुनिक एडवेंचर स्पोर्टस लोगों को रोमांचित करता है। भारतीय संस्कृति, सभ्यता, आधुनिकता, प्रेम और आनंद के साथ समुद्र से चलने वाली बयार के बीच रहने का नाम है रण उत्सव।

इस उत्सव को लेकर आखिरकार ठीक ही कहा गया है

इंसान हर दुख भूल जाता है रण उत्सव के नजारों में।

आखिर कुछ दिन तो गुजारिए यहां लगे शामियानों में।।

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