पहले दलित राष्ट्रपति थे के. आर नारायणन

नईदिल्ली। भारत के राष्ट्रपति पद पर किसी दलित व्यक्ति का आसीन हो जाना वर्ष 2017 में कुछ आसान हो चला है लेकिन, यह 1997 के दौर में बेहद मुश्किल था। देशभर में दलितों को लेकर एक अलग राय थी और राजनीतिक तौर पर भी दलितों का उतना प्रभाव नहीं था जितना आज है। ऐसे में 17 जुलाई 1997 को राष्ट्रपति पद प्राप्त करना बेहद मुश्किल था।

मगर वे इस पद पर आसीन हुए। इसके पहले वे भारत के उपराष्ट्रपति भी रहे। 21 अगस्त 1992 को उन्हें इस पद पर आसीन किया गया। उनका बाल्यकाल भारत के गांवों में बीता। उझावूर में उनका जन्म हुआ। उनके परिवार ने गरीबी का दौर देखा है। 27 अक्टूबर 1920 को वे पेरूमथॅनम उझावूर, त्रावणकोर में जन्मे थे। हालांकि उनके पूर्वज पारवान जाति से संबंन्धित थे और उनका व्यवसाय नारियल तोड़ना था। मगर के आर नारायणन के पिता शिक्षा के महत्व को जानते थे ओर इसे मानते भी थे।

इसलिए उन्होंने के आर नारायणन और उनके चार भाई - बहनों की शिक्षा का प्रबंध किया। उनकी शिक्षा अवर प्राथमिक विद्यालय में प्रारंभ हुई। नारायणन को करीब 15 किलोमीटर दूर तक पैदल चलकर स्कूल के लिए जाना होता था। बचपन में नारायणन की शिक्षा कठिन परिस्थितियों में हुई। उनके पास पुस्तकें खरीदने के लिए भी पैसे नहीं थे। नारायणन की बड़ी बहन होम्योपैथिक चिकित्सक थीं उन्होंने विवाह नहीं किया।

नारायणन के छोटे भाई भास्करन ने भी विवाह नहीं किया। वे अध्यापक थे। कम ही लोग जानते हैं कि नारायणन 1989 से 1991 तक सांसद रहे। राष्ट्रपति रहते हुए उन्होंने महत्वपूर्ण मसलों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं जिसमें इणिया एंड अमेरिका इन अंडरस्टैंडिंग, इमेजेस एंड इनसाइट्स व नाॅन अलाइमेंट इन कन्टैम्परेरी इंटरनेशनल रिलेशंस महत्वपूर्ण है।

टोलेडो विश्वविद्यालय, अमेरिका ने उन्हें डाॅक्टर आॅफ साइंस की उपाधि प्रदान की और आस्ट्रेलिया विश्वविद्यालय ने उन्हें डाॅक्टर आॅफ फिलोसोफी की उपाधि प्रदान की। बीमारी के दौरान के आर. नारायणन ने 9 नवम्बर 2005 को आर्मी रिसर्च एण्ड रैफरल हॉस्पिटल नई दिल्ली में अंतिम सांसेें लीं।

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