महाभारत युद्ध के दौरान रोज मूंगफली खाते थे भगवान श्रीकृष्ण, पीछे था चौकाने वाला रहस्य

महाभारत के युद्ध के बारे में आपने काफी कुछ सुना और पढ़ा होगा। वहीं इस युद्ध के रहस्य हर किसी को अचंभित कर देते हैं और जो भी इसके बारे में पढ़ता या सुनता है हैरान रह जाता है। आप सभी जानते ही होंगे भगवान श्रीकृष्ण ने महायुद्ध में कई ऐसी लीलाएं रचीं, जिससे इंसान को ज्ञान और शक्ति का बोध हुआ। जी हाँ और उन्होंने बिना अस्त्र और शस्त्र उठाए पांडवों को युद्ध में जीत दिलवाई। इन्ही लीलाओं में श्रीकृष्ण ने की एक लीला यह भी थी कि युद्ध से पहले हर रोज मूंगफली खाना। जी हाँ और यह रहस्य इतना बड़ा था कि इसके केवल एक ही व्यक्ति जानता था और उनका नाम था उडूपी के राजा। आज हम आपको बताते हैं इस कथा के बारे में।

कथा के अनुसार- जब महाभारत युद्ध की घोषणा हुई थी, तब कौरव व पांडव देश के सभी राजाओं से धर्म-अधर्म के नाम पर युद्ध में शामिल होने के लिए साहयता मांग रहे थे। कुछ राजाओं ने कौरवों का साथ दिया तो कुछ ने पांडवों का। हालाँकि एक राज्य ऐसा था, जिसने किसी के भी पक्ष में नहीं था और वह था उडूपी। उडूपी के राजा भगवान श्रीकृष्ण के पास आए और कहा कि, 'युद्ध में करोड़ों योद्धा शामिल हो रहे हैं। लेकिन इस दौरान उनके लिए भोजन का प्रबंध कैसा होगा। बिना भोजन के तो योद्धा ज्यादा दिन तक लड़ भी नहीं सकते। इसलिए आपकी आज्ञा हो तो दोनों पक्षों के भोजन की जिम्मेदारी मेरी तरफ से रहेगी।' उडूपी राज्य इस युद्ध में शामिल होने वाले सभी लोगों के लिए भोजन का प्रबंध करेगा।

उडूपी के राजा की बात भगवान श्रीकृष्ण को अच्छी लगी और उन्होंने इसकी इजाजत उनको दे दी, लेकिन राजा के सामने एक और समस्या थी कि वह हर रोज कितने लोगों के लिए भोजन का प्रबंध करें क्योंकि हर दिन कई योद्ध वीरगति को प्राप्त होंगे। अगर भोजन कम रहेगा तो सैनिक भूखे रह जाएंगे और अगर ज्यादा रह गया तो मां अन्नपूर्णा का अपमान होगा। ऐसे में भगवान कृष्ण ने उडूपी के राजा की चिंता को समझा और उसका हल बताया।

श्रीकृष्ण ने कहा कि मैं युद्ध से पहले हर दिन उबले हुए मूंगफली के दाने खाउंगा। जिस दिन जितने मूंगफली के दाने खाऊं, उस दिन उतने हजार सैनिक युद्ध भूमि में वीरगति को प्राप्त हो जाएंगे और इस तरह भगवान श्रीकृष्ण ने यह रहस्य उडूपी के राजा को बताया। कहा जाता है इस रहस्य से हर दिन युद्ध में शामिल होने वाले सभी सैनिक और योद्धाओं को पूरा भोजन मिल जाता था और कभी अन्न का अपमान भी नहीं हुआ।

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