श्राद्ध का सही समय ध्यान से जान लें नहीं तो जीवन भर भुगतना पड़ सकता है

हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार पितरो का श्राद करना जरुरी है ऐसा कहा गया है की जो मनुष्य अपने पितरो का श्राद नहीं करता तथा पिंडदान नहीं करता उन्हें उनके पितरो द्वारा श्राप मिलता है. उनके पितरो की आत्मा इसी संसार में भटकती रहती है. श्राद्ध करने के लिए मनुस्मृति और ब्रह्मवैवर्त पुराण में बताया गया है कि दिवंगत पितरों के परिवार में या तो सबसे बड़ा पुत्र या सबसे छोटा पुत्र और अगर पुत्र न हो तो नाती, भतीजा, भांजा या शिष्य ही तिलांजलि और पिंडदान दे सकते है.

पिंडदान करते समय पूरे विधिविधान से पिंडदान करना चाहिए नहीं तो पिंडदान करते समय ज़रा सी भी गलती हमें संकट में डाल सकती है. इसलिए ऐसे पितरों को आदर पूर्वक अगर उनके भाई भतीजे, भांजे या अन्य चाचा ताउ के परिवार के पुरूष सदस्य पितृपक्ष में श्रद्धापूर्वक व्रत रखकर पिंडदान, अन्नदान और वस्त्रदान करके ब्राह्मणों से विधिपूर्वक श्राद्ध कराते है तो पितर की आत्मा को शान्ति मिलता है. लेकिन ध्यान रहे श्राद का समय हमेशा जब सूर्य की छाया पैरो पर पड़ने लग जाए यानी तब श्राद करना चाहिए सुबह सुबह का श्राद अर्थात 12 बजे के पहले का श्राद पितृ तक नहीं पहुचता.

श्राद्ध के दिन लहसुन, प्याज रहित सात्विक भोजन ही घर की रसोई में बनना चाहिए। जिसमें उड़द की दालए बडे, चावल, दूध, घी से बने पकवान, खीर, मौसमी सब्जी जैसे तोरई, लौकी, सीतफल, भिण्डी कच्चे केले की सब्जी ही भोजन में मान्य है, आलू, मूलीए बैंगन, अरबी तथा जमीन के नीचे पैदा होने वाली सब्जियां पितरों को नहीं चढ़ती है.

 

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