मजदूरों के बिना कैसे चल पाएगा विकास का पहिया

महामारी कोरोना काल चालू है. अभी इसका चरम आना बाकी है. हालात प्रतिकूल हैं, विषम हैं. इस स्वास्थ्य आपदा ने देश के उस विद्रूप को दिखाया है जो दुनिया में सबसे ज्यादा यहीं है. इंडिया और हिंदुस्तान के बीच खाई. पलायन की सबसे बड़ी वजह. हिंदुस्तान सड़कों पर आ चुका है. वह सिसक रहा है. उसके आंसू देखकर कलेजा बैठ जाता है. उसे अपने गांव की देहरी खींच रही है. रो तो इंडिया भी रहा है, लेकिन मन ही मन. खुशहाल कोई नहीं है. जिन प्रदेशों में मजदूरों की पसीनों की बूदों से विकास की खुशबू फैली उसे छोड़ते हुए उन्हें भी अच्छा नहीं लग रहा और प्रदेश को भी चिंता खाए जा रही कि अब हमारा क्या होगा. 

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आपकी जानकारी के लिए बता दे कि इनके बूते ही हमारी सुबह, दोपहर और शाम खुशनुमा होती थी. नियति का चक्र छलनी जैसा कुछ ऐसा चला, कि इंडिया में खझर हो चुके हिंदुस्तान का अपने मुलुक पलायन जारी है. विपदा की इस घड़ी में लोगों के दुख-तकलीफ और आंसुओं के सैलाब को देखते हुए नीति-नियंता भी अपने उस पुराने रुख पर कायम न रह सके जिसमें ‘जो जहां है, वहीं रहे’ की बात कही गई थी. अब कामगारों का यह पलायन स्वास्थ्य विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों द्वारा देश के लिए दोधारी तलवार बताया जा रहा है. अभी महामारी का प्रकोप मुख्यत: महानगरों में है. 

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अगर आपको नही पता तो बता दे कि दिल्ली में जनसंख्या घनत्व 11 हजार से अधिक है जबकि मुंबई जैसे महानगर में यह आंकड़ा 33 हजार को पार करता है. देश के ऐसे जिले जहां ग्रामीण आबादी अधिसंख्य में रहती है, उसका औसत इनसे कई गुना कम है. उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले में जनसंख्या घनत्व एक हजार से कम है. इससे सटे सुल्तानपुर का यह आंकड़ा 800 के करीब है. इस तथ्य को देखते हुए एक उम्मीद यह जगती है कि जब महानगरों से लोग कम होकर गांवों में जाएंगे तो दोनों जगहों पर शारीरिक दूरी को ज्यादा प्रभावी तरीके से लागू किया जा सकता है. गांवों में अपने अपने कामों में व्यस्त लोग एक तरीके से क्वारंटाइन में ही रहते हैं.

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