जानिए गीता के अट्ठारह अध्याय

भगवद्‌गीता हिन्दू धर्म की पवित्रतम ग्रन्थों में से एक है । श्री कृष्ण ने गीता का सन्देश अर्जुन को सुनाया था । यह एक महाभारत के भीष्मपर्व के अन्तर्गत दिया गया एक उपनिषद है । इसमें एकेश्वरवाद, कर्म योग, ज्ञानयोग, भक्ति योग की बहुत सुन्दर ढंग से चर्चा हुई है। इसमें देह से अतीत आत्मा का निरूपण किया गया है।

श्रीमद्भगवद्‌गीता की पृष्ठभूमि महाभारत का युद्घ है। जिस प्रकार एक सामान्य मनुष्य अपने जीवन की समस्याओं में उलझकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है और उसके पश्चात जीवन के समरांगण से पलायन करने का मन बना लेता है उसी प्रकार अर्जुन जो महाभारत का महानायक है अपने सामने आने वाली समस्याओं से भयभीत होकर जीवन और क्षत्रिय धर्म से निराश हो गया है, अर्जुन की तरह ही हम सभी कभी-कभी अनिश्चय की स्थिति में या तो हताश हो जाते हैं और या फिर अपनी समस्याओं से उद्विग्न होकर कर्तव्य विमुख हो जाते हैं।

भारत वर्ष के ऋषियों ने गहन विचार के पश्चात जिस ज्ञान को आत्मसात किया उसे उन्होंने वेदों का नाम दिया। इन्हीं वेदों का अंतिम भाग उपनिषद कहलाता है। मानव जीवन की विशेषता मानव को प्राप्त बौद्धिक शक्ति है और उपनिषदों में निहित ज्ञान मानव की बौद्धिकता की उच्चतम अवस्था तो है ही, अपितु बुद्धि की सीमाओं के परे मनुष्य क्या अनुभव कर सकता है उसकी एक झलक भी दिखा देता है।

उसी औपनिषदीय ज्ञान को महर्षि वेदव्यास ने सामान्य जनों के लिए गीता में संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया है। वेदव्यास की महानता ही है, जो कि ११ उपनिषदों के ज्ञान को एक पुस्तक में बाँध सके और मानवता को एक आसान युक्ति से परमात्म ज्ञान का दर्शन करा सके।

गीता के अट्ठारह अध्याय

१-अर्जुनविषादयोग( दोनों सेनाओं के प्रधान-प्रधान शूरवीरों की गणना और सामर्थ्य का कथन )
इस अध्याय में अर्जुन द्वारा अपने सम्बंधियों को युद्ध में शत्रु दल में अपने सामने खड़ा देख युद्ध से विमुख हो जाने का वर्णन है, जब श्रीकृष्ण अर्जुन के कहने पर रथ को दोनों सेनाओं के बीच में ले जाते है, तो वहाँ अपने पितामह भीष्म, गुरु द्रोण, कृपाचार्य तथा अन्य मित्रों तथा भाईयों को देखकर उसका मन विचलित हो जाता है और वह युद्ध से विमुख होकर रथ के पिछले भाग में जाकर बेठ जाता है।

२-सांख्ययोग( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद )

३-कर्मयोग(ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की श्रेष्ठता का निरूपण)

४-ज्ञानकर्मसंन्यासयोग( सगुण भगवान का प्रभाव और कर्मयोग का विषय )

५-कर्मसंन्यासयोग( सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय )

६-आत्मसंयमयोग( कर्मयोग का विषय और योगारूढ़ पुरुष के लक्षण )

७-ज्ञानविज्ञानयोग( विज्ञान सहित ज्ञान का विषय )

८-अक्षरब्रह्मयोग( ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर )

९-राजविद्याराजगुह्ययोग( प्रभावसहित ज्ञान का विषय )

१०-विभूतियोग( भगवान की विभूति और योगशक्ति का कथन तथा उनके जानने का फल)

११-विश्वरूपदर्शनयोग( विश्वरूप के दर्शन हेतु अर्जुन की प्रार्थना )

१२-भक्तियोग(साकार और निराकार के उपासकों की उत्तमता का निर्णय और भगवत्प्राप्ति के उपाय का विषय)

१३-क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग(ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विषय)

१४-गुणत्रयविभागयोग(ज्ञान की महिमा और प्रकृति-पुरुष से जगत्‌ की उत्पत्ति)

१५-पुरुषोत्तमयोग(संसार वृक्ष का कथन और भगवत्प्राप्ति का उपाय)

१६-दैवासुरसम्पद्विभागयोग(फलसहित दैवी और आसुरी संपदा का कथन)

१७-श्रद्धात्रयविभागयोग(फलसहित दैवी और आसुरी संपदा का कथन)

१८-मोक्षसंन्यासयोग(त्याग का विषय)

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