कर्नाटक का रण: रोचक मुकाबला अपने अंतिम लड़ाई की तरफ

राजनीति के गलियारे में कर्नाटक चुनाव को लेकर राजनैतिक गर्मी चरम पर है जिसमें आहुति डालने का काम कर रही है,लिंगायत, हनुमान, हिंदुत्व और टीपू सुल्तान। इन मुद्दों पर पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ खड़े हुये है। अभी वर्तमान में कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है जिसके मुखिया है सिद्धारमैया। दोनों ही राजनैतिक दलों ने कर्नाटक चुनाव को अपनी नाक का प्रश्न बना लिया है।गौरतलब है कि इससे पहले 2008 में बीजेपी ने पहली अकेले बिना गठबंधन के  कर्नाटक में येदुरप्पा के अगुवाई में पहली बार सरकार बनाई पर बाद में येदुरप्पा को भ्रस्टाचार में लिप्त होने के आरोप के बाद अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी। उसके बाद भी भारतीय जनता पार्टी कर्नाटक की सत्ता में रही पर सिवाय भ्रष्टाचार के और कोई उल्लेखनीय कार्य नही कर सकी जो याद रखने के योग्य हो, 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृव में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस पर भ्रष्टाचार का मुद्दा उछाल कर सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी ने उसी येदुरप्पा को 2018 विधानसभा चुनाव में अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है जिसपर करप्शन का आरोप है, इससे कम से कम ये तो कहा जा सकता है कि भारतीय जनता पार्टी को कुर्सी के अलावा और किसी बात की परवाह नहीं और वो सुविधानुसार राजनीति करती है। उसे सिर्फ सत्ता चाहिए किसी भी क़ीमत पर अभी हालिया कई राज्यों के चुनाव परिणाम इस बात को साबित करने के लिए काफी महत्वपूर्ण रहे हैं। जहाँ तिकड़म से भाजपा सत्ता में आई है। वही दूसरी तरफ कांग्रेस के उम्मीदवार सिद्धारमैया की छवि साफसुथरी और ठीक-ठाक लोकप्रियता के कारण भाजपा की राह कांटो से भरी होने वाली है। येदुरप्पा की भष्टाचार वाली छवि के नाम पर। इसके अलावा जिस तरह से सिद्धारमैया ने लिंगायतों को अलग मान्यता देने का मास्टरस्ट्रोक खेला है ,उससे कांग्रेस पार्टी को लाभ पहुंचने की उम्मीद दिखती है। सिद्धारमैया ने लिंगायतों को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने की सिफारिश की है, राज्यसरकार की हैसियत से। अब यह मामला केंद्र सरकार के पास विचाराधीन है। खुद सिद्धारमैया भी लिंगायत समुदाय से आते है। और भाजपा मुख्यमंत्री प्रत्यासी येदुरप्पा भी। मजे की बात ये है कि 2008 में खुद येदुरप्पा ने इस दिशा में तत्कालीन सरकार को पत्र लिखकर ऐसा करने की मांग की थी पर ठीक ऐन मौके पर कांग्रेस ने राजनीति के चाल को समझ कर इस मांग को आगे बढ़ा कर भाजपा को करारी पटखनी दे दी है। जिससे भाजपा की मुश्किलें बढ़ सकती है क्योंकि कर्नाटक में लिंगायत समुदाय काफी प्रभावशाली है।

17 फीसदी से ज्यादा आबादी वाले लिंगायत समुदाय का राज्य की 224 में से तकरीबन 100 विधानसभा सीटों पर वर्चस्व है। वहीं, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी हाल ही में लिंगायतों के मठ का दौरा किया था जिसके बाद ये पुख्ता हो गया कि कांग्रेस भाजपा के धुविकरण के दाँव को पूरी नही होने देना चाहती है । राहुल गांधी के दौरों के ठीक बाद बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह ने भी लिंगायत समुदाय के धर्म गुरुओं से मुलाकात की कयास ये है कि उन्हें अपने पास लाने की कोई भी कोशिश अमित शाह नही चुकना चाहती। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस। दोनों की नज़र लिंगायत के इस बड़े वोट बैंक पर है । राज्य में एक ही चरण में 224 सीट पर मतदान होगा 12 मई को जनता नई सरकार का चुनाव करने के लिए बटन दबायेगी, वोटों की गिनती 15 मई को होगी। अभी सत्तारूढ़ कांग्रेस के पास 122 सीटें हैं, जबकि बीजेपी के पास 43 और जेडीएस के पास 37 सीटें हैं। कर्नाटक को लेकर बीजेपी ने सारे पत्ते खोल दिये है , योगी आदित्यनाथ से लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक चुनाव प्रचार में उतरे हुये है वहीं अपनी चुनावी रैलियों में कांग्रेस पर हमला करने में भारतीय जनता पार्टी ने कोई कसर नही छोड़ी हैं, कर्नाटक में लोगों का मानना है कि इस चुनाव में लिंगायत को अलग पहचान की मान्यता देने का मुद्दा काफी असरदार साबित होगा इस बार के चुनाव में। उधर भारतीय जनता पार्टी का पुराना रिकॉर्ड रहा है कि वो आखिरी समय मे वोटों का धुविकरण करने का काम करती है। इस बार भी भाजपा वही कर रही है उसका आरोप है कि कांग्रेस हिंदुओं को बांटने का काम कर रही है ये बात खुद अमित शाह ने कही , पर खुद हिंदुत्व का एजेंडा भाजपा के प्राथमिकता में प्रमुख रहा है, चाहे बात राम मंदिर की हो , गाय की हो या साधु संतों की हो। कांग्रेस कभी भी धर्म पर इतना अक्रामक नही रही है, लेकिन अब राहुल गांधी ने भाजपा के इस आरोप का भी काट मंदिर और अन्य तरीकों से देना शुरू कर दिया है। अभी हाल में उनके जन आक्रोष रैली में उनका ये  रूप भी मीडिया को देखने को मिला।

राहुल गांधी ने कहना कि कर्नाटक चुनाव के बाद थोड़ा समय निकाल कर वो कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाना चाहते है, राहुल गांधी का ये बयान एक अलग लाइन खिंचने वाला है , जिससे भाजपा को आने वाले समय मे नुकसान हो सकता है। पिछले साल कर्नाटक में लिंगायत से आने वाली पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या और उसके बाद कट्टरपंथी ताकतों का उसको लेकर प्रदर्शन और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चुप्पी भी नजरअंदाज नही की जा सकती कर्नाटक खासकर के लिंगायतों के नज़र से। सिद्धारमैया सरकार द्वारा कन्नड़ को अनिवार्य भाषा बनाने का समर्थन,ग्रामीण अंचलों के लिए शुरू की गई योजनाओं और विकास का मुद्दा कुल मिलाकर कांग्रेस का पलड़ा भारी करते है। इस चुनाव का खास आकर्षण इस बार ये भी होगा 450 पोलिंग स्टेशन का पूरा प्रबंधन महिला अधिकारियों के जिम्मे होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ताबड़ तोड़ रैलियों का क्या नया नतीजा क्या हैं  जनता पर उसका क्या असर होता है ये तो नतीजे तय करेंगे पर साथ ही जनता केंद्र सरकार में भाजपा के प्रदर्शन का आंकलन तो जरूर करेंगी । उत्तर प्रदेश की तरह इस बार भी भारतीय जनता पार्टी का पूरा कुनबा अपनी नाक बचाने के लिए कर्नाटक में इकट्ठा है। योगी और सिद्धारमैया के बीच पहले ही कई बार ट्विटरवार और जुबानी जंग तेज हो चुकी है. योगी और सिद्धारमैया में पहले भी 'टीपू सुल्तान बनाम हनुमान' की जंग हुई थी. इन सभी नेताओं के अलावा अनंत हेगड़े, संजय पाटिल समेत अन्य नेता भी मैदान में उतर रहे हैं, जो कि अपने आक्रामक भाषणों के कारण जाने जाते हैं। जातिगत समीकरण भी बहुत मायने रखते है लिंगायत के बाद इस चुनाव में।

बीजेपी अपने चुनाव प्रचार और हिंदुत्व  के प्लान को लागू करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा ले रही है वही दूसरी तरफ कांग्रेस भी कह रही है कि सोशल मीडिया और इंटरनेट का अहम योगदान है। जेडीएस प्रमुख एचडी देवगौड़ा ने इस चुनावी लड़ाई को और रोचक बना दिया है ये कहते हुए ,कर्नाटक चुनावों में उनकी पार्टी मायावती के अलावा किसी और से कोई गठबंधन नहीं करेगी. कुल मिलाकर बड़े बड़े दिग्गजो का पुरा कुनबा इस लड़ाई में अपने अपने मतलब की रोटी सेंकने का काम कर रहे है।

 
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