कर्नाटक चुनाव में गिरती संविधान की लाज...

गवर्नर, देश के लिए राष्ट्रपति होता है ठीक वैसे ही किसी राज्य के लिए राज्यपाल होता है. एक ऐसा पद जो संविधान की गरिमा को बनाए रखता है. राज्यपाल चाहे तो अपनी मर्जी से किसी दल को सरकार बनाने का न्यौता दे सकता है. राज्यपाल बिना किसी राजनैतिक दबाव के एक स्वतंत्र पद का नाम है, एक ऐसा पद जो संविधान के दायरों में रहकर अपना काम करता है. 

किसी राज्य में अगर त्रिशंकु विधानसभा परिणाम आते है तो स्वाभाविक है मुख्यमंत्री के लिए राज्यपाल का सीधा हस्तक्षेप होता है, साथ मुख्यमंत्री चुनने का अधिकार भी राज्यपाल के पास होता है, लेकिन इसके लिए राज्यपाल को संविधान में लिखा आर्टिकल 164 (1) और 164(2) को ध्यान में रखना होता है. 

चुनाव के बाद परिणाम के बाद हालात चाहे जैसे भी हो लेकिन संविधान के अनुसार राज्यपाल को बगैर बहुमत के किसी को भी सरकार बनाने का न्यौता नहीं दे सकता वहीं बगैर बहुमत के शपथ तो बहुत ही दूर की बात है, ऐसे में सबसे जरुरी है कि बड़ी छोटी पार्टी देखें बिना राज्यपाल सबसे पहले विधायकों का बहुमत देखे उसके बाद अपना निर्णय ले. 

हालात चाहे त्रिशंकु के हो या साधारण हो, सरकार बनाने के संवैधानिक तरीके से राज्यपाल को सबसे अगर किसी चीज को ध्यान में रखना है तो वह है संवैधानिक बहुमत, त्रिशंकु परिणामों में यही चीज गठबंधन पर तिकी होती है ऐसे में राज्यपाल उसी पार्टी के न्यौता दे सकते है जिसके पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त मात्रा में विधायकों की संख्या मौजूद है, लेकिन  164 (1) और 164(2) में कही भी ये नहीं लिखा है कि बिना बहुमत के किसी नेता को मुख्यमंत्री पद की शपथ. 

लेकिन हाल ही में कर्नाटक चुनाव में जो हुआ वो इस नियम के ठीक विरुद्ध हुआ, यहाँ पर बीजेपी 104 सीट जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है वहीं कांग्रेस 78 और जेडीएस 38 जिसके बाद कांग्रेस और जेडीएस ने गठबंधन किया जिसके बाद कांग्रेस और जेडीएस ने राज्यपाल को सरकार बनाने को लेकर पत्र लिखा लेकिन राज्यपाल ने बिना बहुमत साबित किए बीजेपी को न्यौता भेजा जिसके बाद बिना बहुमत ही येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली जो समझ से परे है. 

ऐसे ही कुछ मामले हाल ही में कुछ महीनों पहले हुए मणिपुर, मेघालय और गोवा चुनाव में भी देखने को मिले थे, यहाँ पर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी लेकिन राज्यपाल ने कांग्रेस को छोड़कर बीजेपी को न्यौता दिया जिसके बाद कम सीट जीतने के बावजूद अभी इन राज्यों में बीजेपी सत्ता में बैठी हुई है. 

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