आखिर क्यों भगवान को लगाया जाता है भोग? जानिए इसके पीछे का रहस्य

भारत देश अपनी धार्मिक मान्यताओं के लिए जाना जाता है वही हिंदू धर्म शास्त्रों में यह प्रथा है कि शख्स भोजन करने से पहले ईश्वर को भोग लगाये, उसके पश्चात् ही फिर भोजन करें। शुद्ध तथा उचित आहार ईश्वर की भक्ति का एक अंग है। भोजन करते वक़्त किसी भी अपवित्र खाद्य पदार्थ का ग्रहण करना निषिद्ध है। यही वजह है कि भोजन करने से पूर्व ईश्वर को भोग लगाने का विधान है। जिससे कि हम शुद्ध एवं उचित आहार ग्रहण कर सकें। अथर्ववेद में बताया गया है कि भोजन को हमेशा ईश्वर को अर्पित करके ही करना चाहिए। भोजन करने से पहले हाथ, पैर और मुंह को अच्छी प्रकार धो लेना चाहिए।   

वही ईश्वर के भोग लगाने का सिर्फ धार्मिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक आधार भी है। यदि आप भोजन को गुस्सा, नाराजगी तथा उतावले पन में करते है, तो यह भोजन सुपाच्य नहीं होगा। जिसका शरीर तथा मन पर नकारात्मक असर पडेगा। कई हिंदू परिवारों में ऐसी व्यवस्था है कि भोजन बन जाने के पश्चात् सबसे पहले ईश्वर को भोग लगाते हैं। उसके पश्चात् ही घर परिवार के सभी लोग {यहां तक बच्चे और बूढ़े भी} भोजन करते हैं। शास्त्रों में इस बात को धान-दोष (अन्न का कुप्रभाव) दूर करने के लिए जरुरी बताया गया है। भाव शुद्धि के लिए भी यह आवश्यक है।

हालांकि कतिपय व्यक्ति इस बात को अंधविश्वास करार देते हैं। एक कहानी के अनुसार, ऐसे ही एक शख्स ने एक बार एक धार्मिक समारोह में जगत गुरु शंकराचार्य कांची कामकोटि जी से यह प्रश्न किया कि ईश्वर को भोग लगाने से भगवान तो उस भोजन को खाते नहीं है और नहीं ही उसके रूप, रंग या स्वरूप में कोई बदलाव होता है। तो क्या भोग लगाना एक अंधविश्वास नहीं है?

जगत गुरु शंकराचार्य कांची कामकोटि जी ने समझाते हुए बताया कि जिस तरह आप मंदिर जाते हो तो प्रसाद के लिए ले गई चीज मंदिर में ईश्वर के चरणों में अर्पित करते हो। अर्पित करने के पश्चात् जब अप उस अर्पित की गई चीज को वापस लेते हो तो भी उसके आकार-प्रकार तथा स्वरूप में कोई बदलाव हुए बिना प्रसाद बन जाता है ठीक उसी तरह यह भोग भी प्रसाद बन जाता है।

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