ये हैं भारतीय वकालत के 'पितामह' के. परासरण, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में की थी रामलला की पैरवी

Nov 10 2019 02:55 PM
ये हैं भारतीय वकालत के 'पितामह' के. परासरण, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में की थी रामलला की पैरवी

नई दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय ने दशकों से चले आ रहे अयोध्या के रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद पर शनिवार को ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या की विवादित जमीन का हक रामलला विराजमान को दिया और मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही अलग से 5 एकड़ ज़मीन देने के लिए कहा है. इस पूरे मामले में कई दिनों तक जिरह हुई थी. अदालत में घंटों तक बहस चलती रही. वकीलों ने अपनी दलीलें भी रखीं, जिन्होंने जमकर सुर्खियां बटोरीं.

इनमें से ही एक वकील हैं के. परासरण, जिन्होंने रामलला विराजमान की तरफ से पक्ष रखा. 92 वर्षीय के. परासरण को इंडियन बार का पितामह कहा जाता है. आइए जानते हैं उनके करियर से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें...

-    के. परासरण ने रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में रामलला विराजमान की तरफ से पक्ष रखा. वह हिंदू शास्त्रों के अच्छे जानकार हैं, वकीलों के खानदान से सम्बन्ध रखते हैं. के. परासरण दो बार देश के अटॉर्नी जनरल रह चुके हैं.

-    इस मामले की सुनवाई के दौरान उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में कहा था कि अपनी अंतिम सांस लेने से पहले वह इस मामले में पूरा न्याय चाहते हैं.

-    मद्रास उच्च न्यायलय के चीफ जस्टिस रहे संजय किशन कॉल ने के. परासरण को इंडियन बार का पितामह कहा था.

-    अयोध्या मामले के अलावा के. परासरण ने सबरीमाला मामले में नायर सोसाइटी की तरफ से दलीलें रखी थीं.

-    के. परासरण ने 1958 में शीर्ष अदालत में बतौर वकील प्रैक्टिस शुरू की. जब देश में इमरजेंसी लगी तो वह तमिलनाडु के एडवोकेट जनरल थे, 1980 में वह देश के सॉलिसिटर जनरल बने. 1983 से 1989 तक वह देश के अटॉर्नी जनरल के पद पर रहे.

-    अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने के. परासरण को पद्म भूषण से सम्मानित किया. बाद में मनमोहन सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण दिया और राज्यसभा के लिए नॉमिनेट भी किया

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