21 सितंबर को है जिउतिया व्रत, जानिए 'जीमूतवाहन' की कथा

Sep 20 2019 06:00 PM
21 सितंबर को है जिउतिया व्रत, जानिए 'जीमूतवाहन' की कथा

इस बार जीवित्पुत्रिका' या जिउतिया व्रत कल यानी 21 सितंबर को है. ऐसे में यह कल से नहाय-खाय के साथ शुरू हो जाएगा और कहा जाता है पुत्र के अच्छे स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए किया जाने वाला यह व्रत मुख्यतौर पर बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में किया जाता है. ऐसे में आज हम आपको इसकी  एक कथा बताने जा रहे हैं जो आपको जरूर इस दिन सुननी चाहिए. आइए जानते हैं इस व्रत की दूसरी कथा.
 
'जीमूतवाहन' की कथा - गन्धर्वों के एक राजकुमार थे जिनका नाम 'जीमूतवाहन' था. वह बहुत उदार और परोपकारी थे. बहुत कम उम्र में उन्हें सत्ता मिल गई थी लेकिन उन्हें वह मंजूर नहीं था. इनका मन राज-पाट में नहीं लगता था. ऐसे में वे राज्य छोड़ अपने पिता की सेवा के लिए वन में चले गये. वहीं उनका मलयवती नाम की एक राजकन्या से विवाह हुआ.

एक दिन जब वन में भ्रमण करते हुए जीमूतवाहन ने वृद्ध महिला को विलाप करते हुए देखा. उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने वृद्धा से उसके दुख का कारण पूछा. इस पर वृद्धा ने बताया, 'मैं नागवंश की स्त्री हूं और मेरा एक ही पुत्र है. पक्षीराज गरुड़ के सामने प्रतिदिन खाने के लिए एक नाग सौंपने की प्रतिज्ञा हुई है, जिसके अनुसार आज मेरे ही पुत्र 'शंखचूड़' को भेजने का दिन है. आप बताएं मेरा इकलौता पुत्र बलि पर चढ़ गया तो मैं किसके सहारे अपना जीवन व्यतीत करूंगी. यह सुनकर जीमूतवाहन का दिल पसीज उठा. उन्होंने कहा कि वे उनके पुत्र के प्राणों की रक्षा करेंगे. जीमूतवाहन ने कहा कि वे उस स्त्री के पुत्र के बदले खुद अपने आपको लाल कपड़े में ढककर वध-शिला पर लेट जाएंगे. जीमूतवाहन ने ऐसा ही किया. ठीक समय पर पक्षीराज गरुड़ पहुंच गए और वे लाल कपड़े में ढके जीमूतवाहन को अपने पंजे में दबोचकर पहाड़ के शिखर पर जाकर बैठ गए.

गरुड़जी यह देखकर आश्चर्य में पड़ गये कि उन्होंने जिन्हें अपने चंगुल में गिरफ्तार किया है उसके आंख से आंसू और मुंह से आह तक नहीं निकल रहा है. ऐसा पहली बार हुआ था. आखिरकार गरुड़जीने जीमूतवाहन से उनका परिचय पूछा. पूछने पर जीमूतवाहन ने उस वृद्धा स्त्री से हुई अपनी सारी बातों को बताया. पक्षीराज गरुड़ हैरान हो गए. उन्हें इस बात का विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कोई किसी की मदद के लिए ऐसी कुर्बानी भी दे सकता है.

गरुड़जी इस बहादुरी को देख काफी प्रसन्न हुए और जीमूतवाहन को जीवनदान दे दिया. साथ ही उन्होंने भविष्य में नागों की बलि न लेने की भी बात कही. इस प्रकार एक मां के पुत्र की रक्षा हुई. मान्यता है कि तब से ही पुत्र की सुरक्षा हेतु जीमूतवाहन की पूजा की जाती है.

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