उल्लास और आनंद के बीच मिलता है भारतीयता का परिचय

Mar 17 2015 01:08 AM
उल्लास और आनंद के बीच मिलता है भारतीयता का परिचय
तीनों ओर से समुद्र से घिरा हुआ यह भू - भाग हमेशा से ही विदेशियों के आकर्षण का केंद्र रहा है। सबसे बड़ी खासियत इस देश की विविधता रही है। इतनी विविधता ऐसी कि व्यक्ति केवल ढूंढते ही रह जाए। हर कदम पर, हर डगर पर बस विविधता ही नज़र आती है। मगर इस विविधता में भी एकता के दर्शन हो ही जाते हैं। सारा देश अपने नववर्ष को मनाता है। हां, वर्तमान में अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार न्यू ईयर सेलिब्रेट करने की परंपरा है। मगर आज भी बड़े पैमाने पर भारतीय पंचांग के अनुसार नववर्ष मनाए जाने की अपनी परंपरा है। यही नववर्ष कहीं चैत्र नवरात्रि की शुरूआत के तौर पर तो कहीं अन्य तरह से मनाया जाता है लेकिन इस पर्व को मनाए जाने का अपना महत्व है।
 
कहीं इस पर्व को नववर्ष के स्वागत और शक्ति के जागरण के तौर पर मनाया जाता है मगर सत्य यही है कि हर कहीं इसे मनाया जाता है। इसे मनाए जाने के भी अपने अलग अलग तरीके हैं मगर सभी ओर संदेश एक ही है। हर कहीं समृद्धि की कामना की जाती है, लोग बेहद उत्साहित होते हैं। सदियों से कहा जाता रहा है कि हिंदू धर्म विज्ञान सम्मत है। यह वह धर्म है जिसमें प्रकृति के साथ संबंध जोड़कर प्रकृति और ईश्वर की आराधना की जाती है। यही नहीं यह प्रकृति की नवीनता का परिचायक है। प्रकृति में ऋतु परिवर्तन के साथ मानव के मन में छाने वाले उल्लास को उत्सव में बदलने का अवसर है।
 
चैत्र प्रतिपदा, नववर्ष संस्कृतियों को पोषित करने का एक अवसर है। जी हां, भारतीय पंचांग जिसे हम विक्रम संवत् कहते हैं पूरी तरह से ऋतुओं और चंद्र की कलाओं पर आधारित है। इस पंचांग में जहां प्रत्यैक मास के दो पक्ष दर्शाए गए हैं वहीं ये दो पक्ष पंद्रह - पंद्रह दिनों पर बदलने वाली चंद्र कलाओं पर आधारित हैं। इन दिनों में पड़ने वाले प्रत्येक दिन को हम सूर्योदय और सूर्यास्त के अनुसार बांटते हैं। उस दिन की तिथि का निर्धारण भगवान सूर्य की किरणों के स्पर्श से ही होता है। जाहिर सी बात है इस पर्व में ऋतु, ऋतुओं के माध्यम से होने वाले परिवर्तन को लेकर उत्सव मनाया जाता है। क्योंकि सूर्य और चंद्र की कलाओं से ही प्रकृति का परिवर्तन होता है। चैत्र नववर्ष अर्थात् गुढ़ी पड़वा भी इसी बात का परिचायक है।
 
इस पर्व के अवसर पर विधिविधान से पूजन करने के बाद प्रसाद के तौर पर गुड़ और नीम की प्रसादी का वितरण किया जाता है। यही नहीं इस प्रसादी वितरण के माध्यम से मौसमी परिवर्तन के प्रति शरीर को संपुष्ट किए जाने का संदेश दिया जाता है। दूसरी ओर वातावरण में जहां हल्की सर्दी और दिन में ग्रीष्म का आगाज़ हो जाता है, ऐसे में शरीर को नीम और गुड़ के माध्यम से रोगप्रतिरोधकता प्रदान की जाती है। यही नहीं नववर्ष के इस उल्लासित वातावरण में प्रकृति के दो रूप कड़वे और मीठे का मिश्रण नीम और गुड़ के तौर पर किया जाता है। इससे यह बात जाहिर होती है कि जीवन में कड़वा और मीठा दोनों ही अनुभव आवश्यक है। इससे मानव हर तरह की परिस्थिति का सामना कर सकता है।