आज सब अच्छा लिखेंगे। हम आईना लिखेंगे।

आज महिला दिवस पर सब अच्छा-अच्छा लिख रहे। मैं वैसा नहीं लिखूंगा। मैं आईना लिखूंगा। आप देख लेना। काफी अच्छी लगती है उन महिलाओं की कहानियां जिन्होंने मुश्किल दौर से खुद को निकाल कर भारतीय समाज में एक अच्छा मुकाम हासिल किया है. आज के दौर में पहले से हालात थोड़े ठीक है लेकिन बीते दौर में भारतीय समाज में किसी महिला का कोई छोटी सी सफलता भी हासिल करना वैसा ही होता था जैसे माउंट एवरेस्ट की सबसे ऊँची चोटी की चढ़ाई करना.

मुझे लगता है देश में महिलाओं का सबसे अच्छा दिवस तब ही मनाया जा सकता है जब अखबारों में एक सिंगल खबर भी बलात्कार की न हो, क्या देश में कोई ऐसा शहर है जहाँ शहर में शाम ढलने के बाद कोई शराबी पति अपनी पत्नी को नहीं पीटता हो.


शहर-शहर, गाँव-गाँव, हर सुनसान गली, हर मोहल्ला, हर सड़क, अपने साथ एक इतिहास लेकर चलते है कि कभी न कभी इस जगह, उस जगह, हर जगह कोई न कोई बेटी किसी की हवस का शिकार तो बनी होगी. इस जमीं को खुरचने पर वो निशान जरुर यहाँ दबे होगे जो किसी बेटी के सूखे हुए खून के है.


हाँ ये सच है, आज के दिन ऐसी बातें करना शायद ठीक न हो लेकिन मेरा मानना है कि एक तरफ जहाँ लोग उन महिलाओं की बात कर रहे है जो संघर्ष कर अपनी जिंदगी में सफल रही है तो फिर उन महिलाओं की भी बात होनी चाहिए जिन्होंने इस समाज की गन्दी मानसिकता के आगे अपनी जान तक दे दी या फिर उन महिलाओं की जो इस गन्दी मानसिकता का शिकार होने के बाद आज तक दिल में एक टिस लिए बस बीत रही है.


इस समाज ने हमें दहेज़ जैसी प्रथा दी, परिणाम लाखों लड़कियां जिंदा जलाई गई, लाखों पंखें पर झूल गई, लाखों का कोई हिसाब ही नहीं. उन महिलाओं की भी बात करते है जो पैदा होने के पहले ही कचरे में फेंकी जा चुकी है और किसी जानवर का एक टाइम का खाना बनी है. उन महिलाओं की भी जिनके चेहरे पर तेजाब के वो काले निशान आज भी है, आज जब हम महिला दिवस की बात कर रहे है तो तेजाब से जली उस लड़की की टिस के बारे में भी सोचना चाहिए, जिसे आईने से ही नफ़रत हो गई हो. क्या उस लड़की के लिए इस महिला दिवस के कोई मायने है? भारतीय समाज में ये घिनोने खेल बरसों से चलते आए, ये खेल आज भी जस के तस चल रहे है, ये खेल कल भी किसी जिंदगी को बर्बाद करेंगे और न जाने कब तक ये खेल इस समाज का हिस्सा बना रहेंगे। 


खैर आप सभी को महिला दिवस की शुभकामनाएं।

-पीयूष भालसे

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