प्रेरक प्रसंग - गरीब की अमीरी !!

प्रयाग नरेश "लक्ष्मेंद्र" उत्तर भारत के शक्तिशाली राजाओं में से एक था, वह बड़ा प्रतापी, गुणवान, रसिक, विविध कला और युद्ध शास्त्र में निपुण था | एक कुशल प्रसाशक होने के साथ वास्तुकला में निपुण था| इसलिये राजा की ख्याती  दूर-दूर तक थी और उसके राज्य में प्रजा सुखी और संपन्न थी | पर इतना सब कुछ होने के बाद भी  वह स्वयं  मन  से बड़ा अशांत रहता था।  अतेव वो कई बार अपनी इस वृत्ति की शांति के लिये देशाटन पर निकल जाया करता था|

एक दिन भेष बदल कर राजा अपने राज्य की सैर पर निकला। घूमते- घूमते वह एक खेत के निकट से गुजरा , तभी उसकी नज़र एक किसान पर पड़ी, किसान ने फटे-पुराने वस्त्र धारण कर रखे थे, और वह पेड़ की छाँव में बैठ कर भोजन कर रहा था।किसान के वस्त्र देख राजा के मन में आया कि वह किसान को कुछ स्वर्ण मुद्राएं दे दे, ताकि उसके जीवन मे कुछ खुशियां आ पाये।

राजा किसान के सम्मुख जा कर बोला – ” मैं एक राहगीर हूँ , मुझे तुम्हारे खेत पर ये चार स्वर्ण मुद्राएँ गिरी मिलीं , चूँकि यह खेत तुम्हारा है इसलिए ये मुद्राएं तुम ही रख लो। “

किसान – ” ना – ना सेठ जी , ये मुद्राएं मेरी नहीं हैं , इसे आप ही रखें या किसी और को दान कर दें , मुझे इनकी कोई आवश्यकता नहीं। “

किसान की यह प्रतिक्रिया राजा को बड़ी अजीब लगी , वह बोला , ”धन की आवश्यकता किसे नहीं होती भला आप लक्ष्मी को ना कैसे कर सकते हैं ?”

किसान - “सेठ जी , मैं रोज चार आने कमा लेता हूँ , और उतने में ही प्रसन्न रहता हूँ… !!

राजा - “क्या ? आप सिर्फ चार आने की कमाई करते हैं , और उतने में ही प्रसन्न रहते हैं , यह कैसे संभव है !” , राजा ने अचरज से पुछा।

 किसान बोला - ” प्रसन्नता इस बात पर निर्भर नहीं करती की आप कितना कमाते हैं या आपके पास कितना धन है …. प्रसन्नता उस धन के प्रयोग पर और आपकी त्याग वृति पर निर्भर करती है। “

राजा -  तो तुम इन चार आने का क्या-क्या कर लेते हो ?

किसान- इन चार आनो में से एक मैं कुएं में डाल देता हूँ , 
                                      दुसरे से कर्ज चुका देता हूँ , 
                                      तीसरा उधार में दे देता हूँ 
                                      और चौथा मिटटी में गाड़ देता हूँ |

राजा सोचने लगा, उसे यह उत्तर समझ नहीं आया। वह किसान से इसका अर्थ पूछना चाहता था , पर वो जा चुका था।राजा ने अगले दिन ही सभा बुलाई और पूरे दरबार में कल की घटना कह सुनाई और सबसे किसान के उस कथन का अर्थ पूछने लगा।

दरबारियों ने अपने-अपने तर्क पेश किये पर कोई भी राजा को संतुष्ट नहीं कर पाया, अंत में किसान को ही दरबार में बुलाने का निर्णय लिया गया।बहुत खोज-बीन के बाद किसान मिला और राजा ने किसान को सम्मान पूर्वक दरबार में बुलाया।कल का वृत्तांत सुनाने के बाद राजा ने उसके कमाई के सन्दर्भ में किसान से प्रश्न पूछा और चार आने के संबंध में उस अबूझ पहेली का उत्तर जानना चाहा |

किसान बोला ,” हुजूर , जैसा की मैंने बताया था ,
मैं एक आना कुएं में डाल देता हूँ - यानि अपने परिवार के भरण-पोषण में लगा देता हूँ,
2 दुसरे से मैं कर्ज चुकता हूँ -  इसे मैं अपने वृद्ध माँ-बाप की सेवा में लगा देता हूँ ,
3 तीसरा मैं उधार दे देता हूँ -  अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में लगा देता हूँ,
4 और चौथा मैं मिटटी में गाड़ देता हूँ , यानि मैं एक पैसे की बचत कर लेता हूँ

ताकि समय आने पर मुझे किसी से माँगना ना पड़े और मैं इसे धार्मिक ,सामजिक या अन्य आवश्यक कार्यों में लगा सकूँ। “राजा को अब किसान की बात समझ आ चुकी थी, वह जान चुका था की यदि उसे प्रसन्न एवं संतुष्ट रहना है तो उसे भी अपने अर्जित किये धन का सही-सही उपयोग करना होगा।और त्याग की वृति बढ़ाकर धन का सदुपयोग करना होगा , किसान द्वारा इस तरह उपदेशित करने पर राजा ने अपने राज्य के अनावस्यक खर्चो पर लगाम कासी और इन से अर्जित धन लोक कल्याण में लगा दिया |

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