प्रेरक प्रसंग - स्वामीजी की व्यावहारिक सतर्कता

अपनी धर्म यात्रा के दौरान स्वामीजी विदेशी संस्कृति  को करीब से देखने और समझनेे के लिये कई बार  यात्राउन्मुख होना पड़ता था, इसी दौरान एक बार वो विदेश में ट्रैन यात्रा कर रहे थे, की तभी ट्रैन कम्पार्टमेंट में बैठी अँगरेज़ युवतियां उनकी वेश भूषा का मज़ाक बनाने लगी | उन दिनों विश्व के अधिकतर देशो को ब्रिटेन ने गुलाम बना रखा था, और वो गुलाम देशों के सब्यता,संस्कृति, वेश भूषा, और लोगो को हेय दृष्टि से देखते थे| और किसी भी ऐसे देश के देशवासियों को अपमानित और तिरिष्कृत करने का एक भी मौका नही चूकते थे |

अब क्योंकि स्वामीजी कम्पार्टमेंट में भारतीय वेश भूषा में थे, तो उन्होंने स्वामीजी को निचा दिखने और उनका अपमान करने में कोई कसर नही छोड़ी, पर स्वामीजी जैसे उच्च कोटि के साधक गहन शांत मुद्रा में गरिमामय शालीनता के साथ बैठे हुए थे| इतने में लड़कियों को न जाने क्या सूझी वे स्वामीजी से उनकी घडी मांगने लगी तब स्वामीजी ने अपने हातो में राजा द्वारा उपहार में दी गयी घडी पहने हुए थे|

उन्होंने स्वामीजी को उनकी घडी उन्हें देने को कहा, और यदि उन्होंने नहीं दी तो वे सुरक्षाकर्मी से कहेंगे की स्वामीजी उनके साथ शारीरिक शोषण कर रहे थे  ऐसा स्वामीजी को धमकाया| तभी स्वामीजी ने बहरा होने का नाटक किया और लडकियां जो कुछ भी चाहती है उसे लिखकर देने को कहा| लडकियों ने वो जो कुछ भी चाहती है, वो पत्र में लिखा और स्वामीजी को दे दिया|

पत्र हाथ में मिलते ही स्वामी जी बोल पड़े -

“सुरक्षाकर्मी को बुलाइये, मुझे शिकायत करनी है | और पत्र के रूप में सबुत दिखाने लगे | उनके सह यात्री भी उन्हें ऐसा करते देख चोंक गए, माहौल बदलते देख लड़कियों के हौसले पस्त हो गए , और उन्हें समझ में आ गया की बात आगे बड़ी तो उन्हें जेल की हवा खाना पड़ सकती है |

इस तरह स्वामीजी की व्यावहारिक सतर्कता ने प्रतिकारिकता की क्षमता बड़ाई बल्कि स्वाभिमान की रक्षा कर सम्बंधित व्यक्ती के मन में स्वयं के द्वारा किये गए गलत काम के प्रति भय निर्माण किया |

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