प्रेरक प्रसंग - वीर छत्रसाल

बात उस समय की है जब दिल्ली के सिंहासन पर औरंगजेब बैठ चुका था। और वो अत्यंत क्रूर हो था और भोली भली जनता उसके अत्याचारों से परेशान थी | वो जबरदस्ती हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करता और मंदिरों को लूटकर अपने महल भरता| उसके राज में न स्त्रियां सुरक्षीत थी न आम जनता | औरंगजेब के सैनिक आकर   बाज़ारों में मन मानी करते | और विरोध करने पर खून खराब कर करते |

ऐसे ही एक दिन कुछ सैनिक दबंगई करते विन्ध्वासिनी तीर्थ क्षेत्र में आ गए ,मकसद मंदिर को लूटना और वंहा से मिले धन सम्पदा से सरकारी खजाना भरना और लोगो को गुलाम बनाना था | विंध्यावासिनी देवी के मंदिर में उनके दर्शन हेतु उन दिनों मेला लगा हुआ था, जहाँ लोगों की खूब भीड़ जमा थी। 

पन्नानरेश छत्रसाल  उस समय 13-14 वर्ष के किशोर थे। छत्रसाल ने सोचा कि ‘जंगल से फूल तोड़कर फिर माता के दर्शन के लिए जाऊँ।’ उनके साथ  दूसरे राजपूत बालक भी थे। जब वे लोग जंगल में फूल तोड़ रहे थे, उसी समय छः मुसलमान सैनिक घोड़े पर सवार होकर वहाँ आये एवं उन्होंने पूछाः “ऐ लड़के ! विन्ध्यवासिनी का मंदिर कहाँ है ?”

छत्रसालः “भाग्यशाली हो, माता का दर्शन करने के लिए जा रहे हो। सीधे सामने जो टीला दिख रहा है वहीं मंदिर है।”

सैनिकः “हम माता के दर्शन करने नहीं जा रहे, हम तो मंदिर लूटने के लिए जा रहे हैं।”

छत्रसालः ने फूलों की डलिया एक दूसरे बालक को पकड़ायी और गरज उठाः“मेरे जीवित रहते हुए तुम लोग मेरी माता का मंदिर तोड़ोगे ?”

सैनिकः “लड़के ! तू क्या कर लेगा ? तेरी छोटी सी उम्र, छोटी सी तलवार.. कहकर उपहास करने लगे  ?”

छत्रसाल ने एक गहरा श्वास लिया और जैसे हाथियों के झुंड पर सिंह टूट पड़ता है, वैसे ही उन घुड़सवारों पर वह टूट पड़ा। छत्रसाल ने ऐसी वीरता दिखाई कि एक को मार गिराया, दूसरे ब्लॉकों ने भी आतताइयों को देखकर उन्हें सबक सीखना आरम्भ कर दिया, .लोगों को पता चले उसके पहले ही आधा दर्जन फौजियों को मार भगाया। धर्म की रक्षा के लिए अपनी प्राण तक की परवाह नहीं की वीर छत्रसाल ने। वही वीर बालक आगे चलकर पन्नानरेश हुआ।

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