इंदौर: सामने आई अस्पतालों की लापरवाही, भर्ती नहीं कर रहे एक भी मरीज

इंदौर: कोरोना और अन्य बीमारियों से ग्रसित लोगों की इंदौर शहर में लगातार मौत हो रही है. कोरोना के मरीजों की संख्या भले ही दो अंको में हैं, लेकिन अन्य बीमारियों से मरने वालों की संख्या चार अंकों तक पहुंच चुकी है. इन में सबसे ज्यादा मौतें इलाज में देरी के कारण हो रही है. इलाज में देरी के एक महीने में अलग-अलग ढ़ेरों कारण सामने आ रहे हैं, कभी कोई अस्पताल मरीजों को भर्ती नहीं कर रहा है, तो कोई हजारों रूपए की मांग कर रहा है. कोरोना के समय में जहां डॉक्टर्स को भगवान मानकर उनकी हर तरफ तारीफ हो रही है, वहीं इंदौर में ठीक इसके उल्टा ही रूप देखने को मिल रहा है.इंदौर में अस्पतालों के प्रबंधन इस महामारी के विकट समय को एक मौका मान रहे हैं. अस्पताल में आने वाला हर मरीज डरा हुआ होता है और इस डर को ही ये कैश कर रहे हैं. हर केस इन्हें नोटों के बंडल के समान दिख रहा है. इसके उदाहरण जूनीइंदौर टीआई से लेकर आईडीए अधिकारी भल्ला सहित कई लोग हैं, जिनके परिवार और उन्हें बचाने के लिए उनके दोस्तों को चंदा करना पड़ रहा है, क्योंकि अस्पताल प्रबंधकों की भूख इतनी बढ़ी हुई है कि उन्हें रोका नहीं जा पा रहा है. इस पर जिन हाथों को लगाम लगाना है वो हाथ खुद इन्हे प्रशय दे रहे हैं. शहर के नेता हों या जिला प्रशासन सभी इन अस्पतालों की मनमानी होते देख रहे हैं, लेकिन इनकी मनमानी खत्म करना तो दूर ये उन्हें रोकने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे हैं, क्योंकि अस्पतालों के मालिक और प्रबंधक सरकार के बड़े-बड़े स्तंभों से सीधे जुड़े हुए हैं. 

प्रशासन ने अस्पतालों को केटेगरी में तो बांट दिया, लेकिन उनके साथ महीने भर बाद भी एमओयू साइन नहीं किया, जिससे अस्पतालों को लूट मचाने की छूट मिली हुई है. अस्पताल अपने हिसाब से पैसा ले रहे हैं, अपने हिसाब से काम कर रहे हैं, अस्पतालों में जहां लगातार कोरोना के मरीज पहुंच रहे हैं, उनसे इलाज के नाम पर प्रत्येक मरीज को लाखों का बिल अस्पताल थमा रहे हैं. लेकिन यहां सुरक्षा के उपाय क्या हैं इस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. अस्पतालों को 24 घंटे सभी जगह पर सेनेटाइज्ड़ होना चाहिए, लेकिन अस्पतालों में केवल बाहर सेनेटाइजर्स से आने वालों को सेनेटाइज्ड़ कर दिया जाता है, लेकिन अंदर कितनी बार वास्तव में सेेनेटाइजेशन हुआ है ये किसी को नहीं पता. अस्पतालों को  दिखाने के लिए उन्हें धमकी जरूर दी जाती है, लेकिन इलाज नहीं मिलने, मरीजों को परेशान करने की शिकायतें लगातार मिलने के बाद भी एक पर भी कार्रवाई की हिम्मत प्रशासन के कथित सर्वशक्तिमान और शहर के चिंतक नेताओं ने नहीं दिखाई. सभी अंटागफिल हुए पड़े हैं. नेताओं के सपनों के शहर को सपनों में ही बचाया जा रहा है. आंकडों के खेल को खेलने के नाम पर लगातार लोगों को मरने के लिए छोड़ा जा रहा है. क्रुरता का ये आलम हिटलर के गैस चेंबर से भी ज्यादा भयावह है. उन चेंबर्स में चुन-चुनकर केवल यहुदियों को डाला जाता था, मूल जर्मन और आर्यों को नहीं.

लेकिन इंदौर में हालत कुछ अलग ही हैं, यहां अस्पतालों के नाम पर बने मौत चेंबर में बीमार तो इलाज के अभाव में मर रहा है, वहीं इलाज के नाम पर जो पैसा लग रहा है, उससे उसका परिवार बाहर मर रहा है. ये नेता भूल गए कि जिन जन के ये लीडर बनना चाहते हैं, यदि वे ही नहीं रहेंगे तो वे किसका प्रतिनिधित्व करने के नाम पर खुद को जनप्रतिनिधि बनेंगे. जनता के नहीं रहने पर जनसेवक का तमगा पहनकर राज करने वाले अफसर किस पर राज करेंगे इन सभी का अभी जो बर्ताव है वो ही जनता की मौत का सबसे बड़ा कारण बन रहा है. और कानूनी तौर पर देखा जाए तो आईपीसी की धारा 300 में साफ है कि यदि जानबूझकर ऐसा काम किया जाए जिससे किसी की मृत्यू होना तय है तो वो हत्या है. अस्पतालों में इलाज के अभाव में होने वाली जनता की मौत को मैं केवल हत्या ही मानता हूं. ओर हत्या की क्या सजा है वो भी सबको ज्ञात है. इन आत्ममुग्धों को मेरे हिसाब से आईपीसी की धारा 302 के तहत दी जाने वाली सजा ही देना चाहिए.

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