क्या पीएम मोदी का राहत पैकेज बन पाएगा ​अर्थव्यवस्था की संजीवनी ?

पिछले सप्ताह से भारतीय व्यापार मंडल में चर्चा का एकमात्र विषय यही है कि कोविड-19 की वजह से अटकी हुई अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए भारत सरकार क्या-क्या कर सकती है. 12 मई 2020 को भारतीय प्रधानमंत्री ने प्रोत्साहन पैकेज के आकार की घोषणा की जो कि 20 लाख करोड़ रुपये है - तुलनात्मक रूप से यह भारतीय जीडीपी के 10 फीसदी के करीब है. वित्त वर्ष 2020-21 के लिए 20 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा भी केंद्र सरकार की सकल कर प्राप्तियों जितना है, अगर इस वर्ष कोविड-19 संबंधित समस्याएं नहीं होती. इसके बाद, भारत की वित्त मंत्री ने 5 दिनों तक प्रोत्साहन पैकेज का विवरण प्रदान किया. प्रोत्साहन पैकेज राजकोषीय सहायता, मौद्रिक सहायता, व्यापार प्रक्रियाओं को करने में आसानी के साथ-साथ कुछ मूलभूत सुधारों का मिश्रण है.

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आपकी जानकारी के लिए बता दे कि वित्त मंत्री द्वारा घोषित सुधार दूरगामी हैं और इनमें ऐसी कई गतिविधियों को कवर किया गया है, जिनकी मांग कई विशेषज्ञ पिछले 3 दशकों से कर रहे हैं. साथ ही अन्य सुधार भी हैं जैसे भूमि सुधार जो राज्य स्तर पर हो रहे हैं और जिनका उल्लेख भी नहीं किया गया था. इन सुधारों की आवश्यकता के बारे में कोई संदेह नहीं है. इन सुधारों की आवश्यकता थी और यह भारत की तरक्की को अलग मोड़ पर ले जा सकते हैं क्योंकि उनके बिना भारत का दम घुट रहा है. उनमें कुछ बदलाव और कुछ उन्नयन की आवश्यकता हो सकती है. हालांकि, इन सुधारों पर अधिक चर्चा नहीं हुई है क्योंकि सभी कुछ 20 लाख करोड़ रुपये के विवरण पर केंद्रित किया गया था और यह कि एक विशेष क्षेत्र को कितनी प्रोत्साहन राशि दी जाएगी और इसमें से कितना हिस्सा दान में दिया जा रहा है या कि वापस नहीं लिया जाएगा

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इसके अलावा भारतीय प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा होने से बहुत पहले ही अमेरिका, जापान, ब्रिटेन, यूरोप आदि ने अपने विशाल पैकेजों की घोषणा कर दी थी. प्रोत्साहन के रूप में अनुमानित संचयी राशि बहुत बड़ी दिखी और खरबों डॉलर तक पहुंची. हममें से अधिकांश लोग वास्तव में मानते हैं, कि अमीर देशों की सरकारों ने नागरिकों और व्यवसायों को धन इसलिए दिया है ताकि वे अपने पांव पर खड़े हो जाएं और यह धन उन्हें वापस नहीं देना है. यह 'गिव-अवे' (Give-Away) या वापस न पाने के लिए है. वास्तव में, हम सही नहीं मान रहे हैं. समृद्ध देशों द्वारा घोषित प्रोत्साहन का बड़ा हिस्सा दान नहीं है. यदि हम भारत के प्रोत्साहन पैकेज की तुलना अन्य विकासशील देशों के साथ प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद के समान करते हैं, तो कोविड-19 के लिए भारतीय प्रतिक्रिया जीडीपी के प्रतिशत के साथ कहीं अधिक है.

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