जिस त्रिपुरा में जमानत नहीं बची थी वहां इतनी बड़ी जीत कैसे?जानिए

त्रिपुरा में बीजेपी ने वो कर दिखाया है इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी. 25 साल के साम्राज्य को सत्तारूढ़ सीपीआई(एम) सरकार ने खोया और इसका कारण बनी बीजेपी. मगर ये चमत्कार एक दो दिन नहींबल्कि लम्बे समय से की जा रही मेहनत का नतीजा है. टीम, रणनीति और उसका क्रियान्वन ही इस जीत का प्रमुख कारण है जानिए रणनीति और जीत के प्रमुख पहलु -

जनता ने बीजेपी के बदलाव के नारे को ज्यादा पसंद किया.
बीजेपी ने राज्य में प्रति 60 वोटर एक पन्ना प्रमुख तैनात करने की रणनीति बिछाई थी.
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में पन्ना प्रमुखों की रणनीति सफल होने के बाद पार्टी ने त्रिपुरा में भी कुल 42 हजार पन्ना प्रमुख नियुक्त किए. 
इन पन्ना प्रमुखों को उनके हिस्से में आए 60 वोटरों को साधने की जिम्मेदारी दी गई थी. 
बीते दो साल के दौरान लगभग 23 पदाधिकारियों को तीनों राज्यों में केन्द्र सरकार के कामकाज और उपलब्धियों का प्रचार करने की जिम्मेदारी दी थी.
त्रिपुरा में इस अप्रत्याशित जीत के लिए आरएसएस से ट्रेनिंग ले चुके बीजेपी नेता सुनील देवधर की अहम भूमिका रही.
देवधर को चुनावों से पहले बीजेपी ने त्रिपुरा का इंचार्ज नियुक्त किया था.
2014 के आम चुनावों में देवधर ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कैम्पेन मैनेजर की अहम भूमिका निभाई थी.
बीजेपी ने त्रिपुरा जीतने की जिम्मेदारी असम के वित्त मंत्री हेमंता विश्व शर्मा को सौंपी. राज्य में चुनाव का बिगुल बजने से पहले ही जनवरी 2018 से हेमंता शर्मा ने त्रिपुरा में डेरा डालकर बीजेपी की जीत को तय करने का काम किया. असम, अरुणाचल और मणिपुर में बीजेपी सरकार का गठन कराने में भी हेमंता शर्मा की बेहद अहम भूमिका रही है.  
त्रिपुरा समेत पूर्वोत्तर में तीनों राज्यों के चुनाव प्रचार की कमान राम माधव ने संभाली थी.

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