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पिता हो तो ऐसा, चाहे वह वर का हो या वधु का

पिता हो तो ऐसा, चाहे वह वर का हो या वधु का

न्याय,धर्म और समझोते के साथ या किसी का सहायक बनकर आगे बढ़ने वाला अपने जीवन में हमेशा पद और प्रतिष्ठा को प्राप्त करता है, राजा दशरथ जब ऋषि मुनियों के साथ अपने चारों पुत्रों की बारात लेकर राजा जनक के द्वार जनकपुर पहुंचें .

राजा जनक बारात को देख बहुत ही हरसित हुए और उन्होंने बड़े सम्मान के साथ उन सभी बारातियों का स्वागत किया स्वागत की इस वेला में ही राजा दशरथ आगे आये और राजा जनक के पैर छूने लगे तभी जनक जी हाथ जोड़कर कहने लगे की राजन आप यह क्या कर रहे है. आप तो मुझे पाप का भागी बना रहे है,यह तो मेरा फर्ज है. आपका नही आप बड़े है,

आप तो वर पक्ष के है .वर पक्ष हमेशा बड़ा होता है. और वधु पक्ष उनके समक्ष हमेशा झुकता है. यह नियम है. आप इसे भंग न करे . राजन आप यह कैसी उल्टी गंगा बहा रहे है. और उन्होंने दशरथ जी को थाम लिया तब दशरथ जी ने बड़े ही भाव पूर्वक इतने सुन्दर शब्द कहे- यदि आप भी ऐसी सोच रखें तो कभी कोई भी बेटी दुखी नहीं रह सकती है .

दशरथ जी के अनमोल वचन - राजा दशरथ जी ने जनक जी से हाथ जोड़कर बड़े विनम्र भाव के साथ कहा की राजन आप तो दाता है. कन्या रुपी इतना बड़ा दान दें रहे है. में तो याचक हूँ जो की आपके द्वारा कन्या लेने आया हूँ . और कहा की महाराज दाता तो हमेशा बड़ा होता है. फिर तो में याचक हूँ .राजा दशरथ ने जनक जी के समक्ष हाथ जोड़ लिए और कहा अब आप ही बताएं की दाता बड़ा होता है या याचक ?

राजा दशरथ के भाव और उनकी बातों को सुनकर  जनक जी की आँखों से अश्रुधार बहने लगी .

भाग्यशाली है वे जिनके घर जन्म लेती है बेटियां.
हर बेटी के भाग्य में पिता होता है .पर हर पिता के भाग्य में बेटी नहीं होती