कोरोना महामारी के समय में देशवासियों के लिए संकटमोचक बना रेलवे, जानिए कैसे?

कोरोना संक्रमण के पहली लहर के चलते भले ही भारतीय रेलवे की गति पर ब्रेक लग गया था, मगर रेलवे ही है,​ जिसने दूसरी लहर में कोरोना पीड़ितों तक प्राणवायु पहुंचाकर उनकी जान बचाई। बाद में जब ट्रेनें पटरी पर लौटीं तो इसने लोगों को भी वक़्त से गांव-शहर पहुंचाया। रेलवे ने बुनियादी ढांचे के विकास, नवाचार, नेटवर्क क्षमता में विस्तार, माल ढुलाई विविधीकरण तथा पारदर्शिता के मामलों में भी अभूतपूर्व मुकाम प्राप्त किए।

वही कोरोना महामारी में रेलवे ने कोरोना चुनौती का उपयोग भविष्य के विकास और लोगों के लिए यात्रा के अगले स्तर की नींव रखने के मौके के तौर पर किया। वर्ष 2020 ने भारत को कोरोना संक्रमण की वह फोटो दिखाई जो आने वाले समय में और कठिनाइया उत्पन्न कर सकती थी। इस चलते केंद्र सरकार ने कोरोना के प्रसार को रोकने के लिए ’24 मार्च 2020′ को देशव्यापी लॉकडाउन का ऐलान कर दिया। एक बार के लिए ऐसा लगा कि पूरे देश में ठहराव आ गया है। अपने 167 वर्ष के इतिहास में पहली बार, भारतीय रेलवे को अपनी सभी यात्री सेवाओं को बंद करना पड़ा।

वही राष्ट्रीय परिवहन जीवन रेखा, जो तकरीबन 13,500 ट्रेनों में रोजन तकरीबन 800 करोड़ यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने में सहायता करती है, कोरोना के प्रसार को रोकने के लिए सरकारी निर्देशों के तहत रोक दी गई थी। इस का नतीजा यह हुआ कि परिवहन, मनोरंजन, पर्यटन एवं खेल समेत कई उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुए। किन्तु ऐसे वक़्त में रेलवे ही राष्ट्रीय ट्रांसपोर्टर बनकर एक आशा की किरण बनकर उभरी। जी हां, भारतीय रेलवे ने कोरोना संकट में अपने त्रि-आयामी दृष्टिकोण के माध्यम से अपनी जरुरी सार्वजनिक परिवहन एवं माल ढुलाई सेवाओं को जारी रखने के लिए रूपरेखा तैयार की तथा एक कुशल ढंग से महामारी के प्रभावों का डटकर मुकाबला किया।

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