जानिये अमृत कुंभ सिंहस्थ का कैसे हुआ शुभारम्भ

Feb 16 2016 09:32 PM
जानिये अमृत कुंभ सिंहस्थ का कैसे हुआ शुभारम्भ

पुराणों और शास्त्रों के अनुसार हिमालय के उत्तर में क्षीरसागर है. इस सागर में देवता और दानव ने  मिलकर समुद्र का मंथन किया था. मंथन करना एक दंड था. बताया जाता है कि समुद्र मंथन के समय क्रमश: पुष्पक रथ, ऐरावत हाथी, परिजात पुष्प, कौस्तुभ, सुरभि, अंत में  अमृत कुम्भ प्राप्त हुआ था. इस अमृत कुंभ को लेकर स्वयं भगवान विष्णु  प्रकट हुए थे. और मंथन से प्राप्त कुंभ को उन्होंने इंद्र को दिया था.

इंद्र ने उसे अपने पुत्र जयंत को सौंपा. देवताओं की सलाह पर जयंत उस कुंभ को लेकर स्वर्ग की ओर दौड़ा. यह देखकर दैत्य क्रोधित हो उठे और वे अन्य दैत्यों की सहायता लेकर बलपूर्वक उस कुंभ को छीनने के लिए देवताओं के पीछे भागे और उनके बीच देवासुर संग्राम होने लगा. 12 दिन तक युद्ध करने के बाद देवताओं का दल हार गया. इसी बीच पृथ्वी के कई स्थानों पर कुंभ को छिपाया गया था. जिन 4 स्थानों पर कुंभ रखा गया था, उन्हीं स्थानों पर तब से 'कुंभ योग पर्व' मनाया जा रहा है. देवताओं के 12 दिवस  इस नरलोक के 12 वर्ष होते हैं. यही वजह है कि प्रति 12 वर्ष के पश्चात कुंभ में स्नान करने के लिए यह महोत्सव होता है.

देवानां द्वादशाहोभिर्मर्त्यै द्वार्दशवत्सरै:
जायन्ते कुम्भपर्वाणि तथा द्वादश संख्यया:
 
 कुम्भ योग- सूर्य, चंद्र और बृहस्पति देवासुर संग्राम के समय अमृत कुंभ की रक्षा करते रहे. इन तीनों का संयोग जब विशिष्ट राशि पर होता है, तब कुंभ योग आता है. 

उज्जैनी  में कुंभकाल- 

मेषराशिगते सूर्ये सिहंराश्यां वृहस्पतौ
उज्जयिन्यां भवेत कुम्भ: सर्वसौख्य विवर्द्धन:
 
 जब सूर्य मेष राशि में और  बृहस्पति सिंह राशि में आते हैं, तब उज्जैनी में सभी के लिए सुखदायक कुंभयोग आता है। चूंकि बृहस्पति सिंह राशि पर रहते हैं इसलिए सिंहस्थ कुंभयोग के नाम से यह प्रसिद्ध है.
 
घटे सूरि: शशिसूर्य: कुह्याम् दामोदरे यदा
धारायाश्च तथा कुम्भो जायते खुल मुक्तिद:
 
तुला राशि में बृहस्पति, चंद्र और सूर्य के एकत्रित होने पर अमावस्या तिथि के दिन उज्जैनी में शिप्रा तट पर मुक्तिप्रद कुंभयोग होता है.