अब कहां रहा राष्ट्रगान का सवाल!

भारत वह देश है जहां पर भावनाओं की कद्र होती है। यह देश भावना प्रधान है। इस बात को बाजारवादी ताकतें तक अच्छे से समझती हैं और अपने प्रचार - प्रसार में इसे बखूबी डालती हैं। भारतीय अपने देश के प्रति भी भावना प्रधान होते हैं हां मगर फिर चाहे वे स्वच्छ भारत अभियान से अनजान से होकर नियमों को ताक पर रखकर अपने दैनिक जीवन में व्यवहार करें तो किसी को आश्चर्य नहीं होता।

हां मगर अब तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा  चलाए जाने वाले स्वच्छ भारत अभियान के माध्मय से लोग जागृत हुए हैं और तो और 2000 रूपए के नए नोट के आ जाने के बाद बड़े पैमाने पर लोग स्वच्छ भारत अभियान से प्रेरित हो गए होंगे। मगर अब हम एक संजीदा विषय पर चर्चा कर रहे हैं। वह है राष्ट्रगान। आप सोच रहे होंगे कि राष्ट्रगान का विषय भला क्या संजीदा है।

राष्ट्रगान तो देश में हर वर्ष पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी पर बजता रहता है। फिर इसमें अलग बात क्या है। राष्ट्रगान गाने के लिए और इसके बजते ही सीधे खड़े होने के लिए हम कोई बच्चे थोड़े ही हैं। मगर अब आप ऐसा कहकर बच नहीं सकते हैं। जी हां, सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में आदेश जारी किया है कि अब सिनेमाघरों में फिल्म के प्रदर्शन के पहले राष्ट्रगान बजाया जाएगा और लोगों को उसके सम्मान में खड़ा होना होगा।

यहां पर हम न्यायालय के किसी भी आदेश को लेकर कोई टिप्पणी नहीं कर रहे हैं और न्यायालय के आदेश को लेकर कोई समीक्षा भी नहीं कर रहे हैं। मगर यहां पर इस बात को दर्शाना आवश्यक है कि न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है। भारत वह देश है जहां पर लोग न तो साफ - सफाई के लिए जल्दी मन बनाते हैं और न ही राष्ट्रगान की धुन बजने पर अपनी सहजता छोड़कर उसके सम्मान में सावधान होते हैं ऐसा अक्सर होता है।

मगर अब जब सर्वोच्च न्यायिक संस्थान ने राष्ट्रहित में महत्वपूर्ण बात कही है तो लोग देशभक्ति की भावना से ओत- प्रोत माहौल में अपने को पा सकेंगे। राष्ट्रगान की धुन सिनेमा हाॅल में बजने और सावधान की मुद्रा में लोगों के खड़े हो जाने पर कुछ देर के लिए ही सही लोगों के बीच एकता के सूत्र में बंधे होने की भावना घर करेगी। लोग भारतवासी के तौर पर गर्व कर सकेंगे और फिर यहां राष्ट्रगान गाने, न गाने और उसके सम्मान में खड़े होने का कोई विवाद नहीं होगा।

जो कि अक्सर राजनीतिक तौर पर होता आया है। कथित तौर पर कुछ लोग इसका विरोध कर लाभ उठाने का प्रयास करते रहे हैं मगर अब तो इनकी च्वाईस ही समाप्त हो चुकी है अब तो इन्हें राष्ट्रगान का सम्मान कर राष्ट्र का सम्मान करना ही होगा।

हालांकि यह न तो स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार का हनन है यह तो लोगों में कहीं सुप्त से हो गए उन भावों को जगाने का माध्यम है जिसकी नितांत आवश्यकता है। एक विद्वान ने कहा था कि यदि देश में रहने वालों की पहचान करनी हो तो यह देखना चाहिए कि उस देश के बच्चों के होठों पर किस तरह के गीत रहते हैं यदि बच्चे देश के तराने गाते हैं समझ लीजिए वहां पर राष्ट्रभक्त रहा करते हैं।

इसी तरह से राष्ट्रगान गूंजने और उसका सम्मान होने से लोगों के बीच राष्ट्रीय सद्भाव बढ़ेगा। हालांकि सिनेमा घर में राष्ट्रगान गाए जाने को लेकर एक पेंच सामने आता है कि फिल्म प्रारंभ होने के कुछ मिनटों तक लोग बुक की गई सीट तलाशते रहते हैं ऐसे में यह सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि राष्ट्रगान सिनेमा प्रसारण के प्रारंभिक समय में कब प्रारंभ किया जाए।

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