जब इंदिरा गांधी का विरोध कर नौकरी से निकाले गए थे सुब्रमण्यन स्वामी

अर्थशास्त्र और कानून के विद्वान, प्रखरवक्ता, पूर्व केंद्रीय मंत्री, राज्यसभा सांसद एवं बीजेपी के दिग्गज नेता सुब्रमण्यम स्वामी का आज जन्मदिन है। डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी हमेशा ही अपने बयानों को लेकर चर्चाओं में रहते हैं। भारतीय राजनीति में पिछले 4 दशकों से सक्रिय सुब्रमण्यन स्वामी की छवि एक ऐसे राजनेता की है, जो परोक्ष और सांकेतिक आलोचना में बिल्कुल यकीन नहीं रखते हैं और इसी के साथ खुलकर अपने विरोधियों को अपने निशाने पर लेते रहते हैं।

आप सभी को बता दें कि सुब्रमण्यन स्वामी मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था के समर्थक रहे हैं, जो कि इंदिरा गांधी को बहुत अधिक स्वीकार्य नहीं थे। जी दरअसल सुब्रमणयन स्वामी साल 1970 में इंदिरा गांधी की नजर में आए थे। उस समय देश की राजनीति पर उनकी पकड़ काफी मजबूत थी। ऐसे में स्वामी के खुली अर्थव्यवस्था के विचारों को इंदिरा गांधी ने खारिज कर दिया था, और इस पर स्वामी ने अपने बयानों में इंदिरा गांधी सरकार की आलोचना कर दी थी। कहते हैं कि इस बात से इंदिरा गांधी इतनी नाराज हुई थीं कि दिसंबर 1972 में उन्होंने सुब्रमणयन स्वामी को आईआईटी दिल्ली की नौकरी से निकाल दिया था। इस बर्खास्तगी के खिलाफ स्वामी कोर्ट गए और केस जीते भी और अपनी बात को साबित करने के लिए स्वामी एक दिन के लिए आईआईटी की नौकरी पर गए और फिर अगले दिन इस्तीफा दे दिया।

आपको बता दें कि सुब्रमण्यन स्वामी ने महज 24 साल की उम्र में अपनी प्रतिभा के दम पर हावर्ड से पीएचडी की डिग्री हासिल कर ली थी और 27 की उम्र में हावर्ड में पढ़ाने भी लगे थे। इसी के साथ वह मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था के पक्षधर रहे हैं। केवल यही नहीं बल्कि उनकी प्रतिभा को देखते हुए नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने उन्हें दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाने के लिए आमंत्रित किया था। इसके अलावा उनके बाजार हितैषी विचार मनमोहन सिंह के प्रसिद्ध 1991 के बजट से काफी पहले ही लोकप्रिय हो गए थे।

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