आखिर कैसे संकटमोचन हनुमान बने महावीर, पढ़े पौराणिक कथा

हर साल मनाया जाने वाला हनुमान जन्मोत्सव इस साल 16 अप्रैल को मनाया जा रहा है। वहीं हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, हनुमान जी का जन्म चैत्र पूर्णिमा को हुआ था, इस वजह से हर साल चैत्र पूर्णिमा को हनुमान जन्मोत्सव मनाया जाता है। आप सभी को बता दें कि हनुमान जी भगवान शिव के अंश थे और उनके पिता ​केसरी और माता अंजना थीं। कहा जाता है जब उनका जन्म हुआ तो वे बहुत ही तेजवान, कांतिमय, बुद्धिमान एवं बलशाली थे। उसके बाद जैसे जैसे वह बड़े हुए, वैसे वैसे उनकी बाल्यकाल की शरारतें भी बढ़ने लगीं। इसी तरह उनके बाल्यावस्था से जुड़ी एक कथा है, जिसमें उनके महावीर बनने का वर्णन मिलता है। आज हम आपको उसी कथा के बारे में बताने जा रहे हैं।

जानिए महावीर हनुमान की कथा- पौराणिक कथा के अनुसार, एक दिन बालक हनुमान आंगन में खेल रहे थे, उस दौरान उनको भूख लगी। उन्होंने उगते हुए सूर्य को फल समझ लिया। उन्होंने उस लाल रंग के चमकीले फल को खाने के लिए आसमान में छलांग लगा दी। वे वायु के वेग से आसमान में उड़ने लगे और देखते ही देखते सूर्य लोक पहुंच गए। जैसे ही वे सूर्य देव के पास पहुंचे, उनको निगलने के लिए अपना मुंह खोल दिया। यह देखकर सूर्य देव वहां से भागने लगे। अब सूर्य देव आगे आगे और बाल हनुमान उनके पीछे पीछे। यह देखकर देवराज इंद्र आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने सूर्य देव को बचाने के लिए हनुमान जी पर वज्र से प्रहार कर दिया। इसके परिणाम स्वरुप बाल हनुमान पृथ्वी पर गिर पड़े।

इस बात की ज्ञान जब पवन देव को हुआ तो वे क्रोधित और दुखी हो गए क्योंकि हनुमान जी पवन पुत्र भी हैं। शोकाकुल पवन देव मूर्छित हनुमान जी को लेकर एक गुफा में चले गए और वहां पर उनकी मूर्छा टूटने की प्रतीक्षा करने लगे। उधर, वायु देव के न होने के कारण पशु, पक्षी, मनुष्य सब त्राहि त्राहि करने लगे। पृथ्वी पर हाहाकार मच गया। उधर इंद्र देव को भी पता चल चुका था कि जिस बालक पर उन्होंने प्रहार किया था, वह कोई सामान्य बालक नहीं हैं।

वह रुद्रावतार हनुमान हैं। वायु देव के दुख को दूर करने और पृथ्वी पर वायु के संकट को दूर करने के लिए त्रिदेव के साथ सभी प्रमुख देवता उस गुफा में प्रकट हुए। वहां पर सभी देवों को रुद्रावतार हनुमान जी के बारे में पता चला। ब्रह्मा, विष्णु, महेश समेत सभी देवताओं ने हनुमान जी को अपनी दिव्य शक्तियों से सुसज्जित कर दिया। सूर्य देव ने हनुमान जी को शिक्षा देने का दायित्व लिया। बाद में वे हनुमान जी के गुरु बने। इस प्रकार सभी देवों की शक्तियों के मिलने से पवनपुत्र महावीर हनुमान बन गए, जो अपने प्रभु श्रीराम के संकटमोचन कहलाए।

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