हनुमानजी के स्मरण मात्र से ही व्यक्ति में ज्ञान बुद्धिबल एवं वाक्पटुता आ जाती है।

शास्त्र गारुड़ी तंत्र, सुदर्शन संहिता और अगस्त्यसंहिता आदि के अनुसार हनुमान जी ज्ञान और विद्या के प्रतीक हैं। मनुष्य को ज्ञान और विद्या प्राप्त करने पर ही उसका आत्मविश्वास स्वतः स्फूर्त हो जाता है और फिर जटिल से जटिल समस्या का समाधान हो जाता है क्योंकि हनुमान जी में ज्ञान और विद्या नैसर्गिक रूप से विद्यमान हैं इसलिए वे ज्ञानगुरू कहलाते हैं तथा हनुमान चालीसा में उन्हें ज्ञान गुण सागर कहकर संबोधित किया है।

हनुमदुपनिषद् के अनुसार अज्ञान से त्रस्त व्यक्ति जब हनुमान जी की शरण में भक्ति भाव से लग जाता है तब उन्हीं की कृपा से व्यक्ति को ज्ञान गुण और आत्मविश्वास प्राप्त हो जाते हैं। आनंद रामायण के इस श्लोक के अनुसार 

यथा बुद्धिर्बलं यशो धैर्यं निर्भयत्वमरोग्यता। सदुढ्र्यं वाकस्फरुत्वं च हनमु त्स्मरणाद् भवेत।। 
अर्थात हनुमानजी के स्मरण मात्र से ही व्यक्ति में ज्ञान, बुद्धिबल एवं वाक्पटुता आ जाती है।

ऐसा शास्त्रों में वर्णन है कि भगवान श्रीराम की रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद हनुमान जी हिमालय पर शिव आराधना के लिये चले गए थे। अपनी तपस्या के दौरान उन्होंने हिमालय की पर्वत शिलाओं पर अपने नाखून से प्रभु श्रीराम के कर्मों का उल्लेख करते हुए हनुमद रामायण की रचना की। कुछ समयोपरांत जब महर्षि वाल्मिकी भगवान शंकर को स्वयं द्वारा रामायण दिखाने पहुंचे तो उन्होंने हनुमान जी द्वारा रचित रामायण भी देखी। हनुमद रामायण के दर्शन कर वाल्मिकी जी निराश हो गए। महर्षि वाल्मिकी को निराश देखकर हनुमान जी ने उनसे उनकी निराशा का कारण पूछा तो महर्षि बोले कि उन्होने कठोर परिश्रम के पश्चात जो रामायण रची है वो हनुमद रामायण के समक्ष कुछ भी नहीं है अतः आने वाले समय में उनकी रचना उपेक्षित रह जाएगी। 

विद्यावान गुणी और चातुर हनुमानजी श्रीराम के परम भक्त वाल्मिकी जी की चिंता का शमन करते हुए हनुमानजी ने हनुमद रामायण पर्वत शिला को एक कंधे पर उठाया और दूसरे कंधे पर महर्षि वाल्मिकी को बिठा कर समुद्र के पास गए और स्वयं द्वारा की गई रचना को श्रीराम को समर्पित करते हुए समुद्र में समा दिया। तभी से हनुमान द्वारा रची गई हनुमद रामायण उपलब्ध नहीं है।
 
तदुपरांत महर्षि वाल्मिकी ने कहा कि "आप धन्य हैं हनुमान जी, आप जैसा कोइ दूसरा नहीं है और साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि वो हनुमानजी की महिमा का गुणगान करने के लिए एक जन्म और लेंगे। इस बात को उन्होने अपनी रचना के अंत में भी कहा है।

माना जाता है कि रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास कोई और नहीं बल्कि महर्षि वाल्मिकी का ही दूसरा अवतार थे। महाकवि तुलसीदास के समय में ही एक पटलिका को समुद्र के किनारे पाया गया जिसे कि एक सार्वजनिक स्थल पर टांग दिया गया था ताकी विद्यार्थी उस गूढ़लिपि को पढ़कर उसका अर्थ निकाल सकें। ऐसा माना जाता है कि कालीदास ने उसका अर्थ निकाल लिया था और वो ये भी जान गये थे कि ये पटलिका कोई और नहीं अपितु हनुमानजी द्वारा रचित हनुमद रामायण का ही एक अंश है जो कि पर्वत शिला से निकल कर जल के साथ प्रवाहित होकर यहां तक आ गया है। उस पटलिका को पाकर तुलसीदास ने अपने आपको बहुत भग्यशाली माना कि उन्हें हनुमद रामायण के श्लोक का एक पद्य प्राप्त हुआ है।

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