आज है गाडगे बाबा जयंती, जानिए कौन थे और क्यों हुए थे यह प्रसिद्ध

आप सभी को बता दें कि आज गाडगे बाबा जयंती है और आज ही के दिन गाडगे बाबा का जन्म महाराष्ट्र के अमरावती जिले के शेणगांव अंजनगांव में हुआ था और उनका बचपन का नाम डेबूजी झिंगराजी जानोरकर था. वहीं बताया जाता है कि उन्होंने महाराष्ट्र के कोने-कोने में अनेक धर्मशालाएं, गौशालाएं, विद्यालय, चिकित्सालय तथा छात्रावासों का निर्माण कराया और यह सब उन्होंने भीख मांग-मांगकर बनावाया था. कहते हैं उन्होंने अपने सारे जीवन में अपने लिए एक कुटिया तक नहीं बनवाई और उन्होंने धर्मशालाओं के बरामदे या आसपास के किसी वृक्ष के नीचे ही अपनी सारी जिंदगी बिता दी.

कहते हैं गुरुदेव आचार्य जी ने बताया है कि एक लकड़ी, फटी-पुरानी चादर और मिट्टी का एक बर्तन जो खाने-पीने और कीर्तन के समय ढपली का काम करता था, यही उनकी संपत्ति थी और इसी से उन्हें महाराष्ट्र के भिन्न-भिन्न भागों में कहीं मिट्टी के बर्तन वाले गाडगे बाबा व कहीं चीथड़े-गोदड़े वाले बाबा के नाम से पुकारा जाता था. आपको बता दें कि उनका वास्तविक नाम आज तक किसी को ज्ञात नहीं है लेकिन लोग कयास लगाने से नहीं चूकते हैं. वहीं यह भी बताया जाता है कि बाबा अनपढ़ थे, किंतु बड़े बुद्धिवादी थे और पिता की मौत हो जाने से उन्हें बचपन से अपने नाना के यहां रहना पड़ा था. वहीं उन्हें गायें चराने और खेती का काम करना पड़ा था और साल 1905 से 1917 तक वे अज्ञातवास पर रहे. कहते है इस दौरान उन्होंने जीवन को बहुत नजदीक से देखा और अंधविश्वासों, बाह्य आडंबरों, रूढ़ियों तथा सामाजिक कुरीतियों एवं दुर्व्यसनों से समाज को कितनी भयंकर हानि हो सकती है, इसका उन्हें भलीभांति अनुभव हुआ.

बस इस वजह से उनका उन्होंने घोर विरोध किया. कहते हैं संत गाडगे बाबा के जीवन का एकमात्र ध्येय था- लोक सेवा था वह दीन-दुखियों तथा उपेक्षितों की सेवा को ही वे ईश्वर भक्ति मानते थे और धार्मिक आडंबरों का उन्होंने प्रखर विरोध किया. कहा जाता है वह विश्वास में थे कि ईश्वर न तो तीर्थस्थानों में है और न मंदिरों में व न मूर्तियों में. वह मानते थे कि दरिद्र नारायण के रूप में ईश्वर मानव समाज में विद्यमान है और मनुष्य को चाहिए कि वह इस भगवान को पहचाने और उसकी तन-मन-धन से सेवा करें. इसी के साथ भूखों को भोजन, प्यासे को पानी, नंगे को वस्त्र, अनपढ़ को शिक्षा, बेकार को काम, निराश को ढाढस और मूक जीवों को अभय प्रदान करना ही भगवान की सच्ची सेवा मानते थे.

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