फ्रैंकलिन टेंपलटन को लेकर उलझन बढ़ी, जानें क्या है वजह

मू​सीबत या तकलीफ में कानून की शरण में जाना हर नागरिक का अधिकार भी है और कई बार सहज प्रतिक्रिया भी। लेकिन कई किसी मामले को कानून तक ले जाना उसे सुलझाने से पहले उलझा देता है। फ्रैंकलिन टेंपलटन मामले को अदालत तक ले जाने का मामला भी उनमें से ही एक प्रतीत हो रहा है। इस मामले को जिस तरह से अदालत ले जाया गया है, उससे स्पष्ट दिख रहा है कि कुछ निवेशकों को नियामकों में भी विश्वास नहीं रह गया है। इसका एक असर यह भी होगा कि जिन निवेशकों को मामला अदालत के बाहर और बिना किसी कानूनी पचड़े के सुलझता दिख रहा था, उन्हें भी अब लंबा इंतजार करना पड़ेगा। शायद इस पूरे तंत्र का कोई हिस्सा अपनी गलती दूसरे पर थोपने की मंशा के तहत ऐसा ही चाहता होगा.

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आपकी जानकारी के लिए बता दे कि भारत के डेट फंड में लिक्विडिटी का संकट जटिल हो गया है। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि कुछ निवेशक इस मामले को लेकर अदालत में चले गए हैं। वैसे तो यह किसी भी भारतीय का अधिकार है कि अगर वह चाहता है तो कानून की मदद ले। लेकिन इस मामले में निवेशकों का ऐसा करना शायद उनके हित में न हो। वही, हम पीछे मुड़ कर देखते हैं कि यह स्थिति पैदा क्यों हुई। अप्रैल के आखिरी सप्ताह में फ्रैंकलिन टेंपलटन ने अपने छह डेट फंड बंद कर दिए। इस तरह से निवेशकों की लगभग 30,000 करोड़ रुपये की रकम फ्रीज हो गई है। इनमें फ्रैंकलिन इंडिया लो ड्यूरेशन फंड, फ्रैंकलिन इंडिया अल्ट्रा शॉर्ट बांड फंड, फ्रैंकलिन इंडिया शॉर्ट टर्म इनकम प्लान, फ्रैंकलिन इंडिया क्रेडिट रिस्क फंड, फ्रैंकलिन इंडिया डायनमिक एक्युरल फंड और फ्रैंकलिन इंडिया इनकम ऑपरच्युनिटीज फंड शामिल हैं. 

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इसके अलावा भारत में ओपन-एंड फंड के इतिहास में यह अप्रत्याशित है। फ्रैंकलिन ने यह कदम इसलिए उठाया क्योंकि उसने पाया कि बांड मार्केट फ्रीज हो गया था और वह इन फंडों द्वारा खरीदे गए बांड्स बेच नहीं पा रही थी, जबकि फंड खरीदने वालों की ओर से अपना निवेश भुनाने की रिक्वेस्ट सिर पर थी। फंड हाउस का प्लान यह है कि वह निवेशकों की मांग पर फंड भुनाना बंद करेगी, जैसा कि ओपन-एंडेड फंड आमतौर पर काम करते हैं। लेकिन जब वह बांड्स बेच पाएगी या बांड्स की मैच्योरिटी खत्म होगी तो वह रकम को भुनाती रहेगी। बांड्स पर इंटरेस्ट पेमेंट मिलने पर भी इसे निवेशकों को दिया जाएगा. 

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