कुछ पाने की चाहत में छूट रहा है सबकुछ

अभी उसकी मेहंदी सूखे हुए दो वर्ष भी नहीं बीते थे कि उसकी मांग का सिंदूर मिट गया। खुद उसकी चाहतों और गलतियों ने उसे इतना मजबूर कर दिया कि उसके दिन का सकून पुलिस के सवालों और रातें लाॅकअप के घेरे में सिमट गया। रक्षाबंधन बीते कुछ ही दिन हुए थे कि अपनी बहन को प्रेम संबंध रखने से रोकने वाले बड़े भाई की कलाई खून से रंग गई और फर्श लाल हो गया। मुंबई का शीना हत्याकांड इसे लेकर कुछ कहने की जरूरत नहीं बीते दिनों के समाचार पत्र, समाचार चैनलों के बुलेटिन इसी से भरे हुए थे। ये सभी सत्य कथाऐं हैं। ऐसी सत्य कथाऐं जिनका हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

हर कोई ऐसे घटनाक्रमों को लेकर सहम जाता है। सिहर उठता है। रिश्ते ही रिश्तों का कत्ल कर रहे हैं। अब तक तो मानवीय संवेदनाऐं मर रही थीं मगर अब तो जान छिड़कने वाले ही एक दूसरे के जानी दुश्मन बन गए हैं। आखिर कुछ पाने की चाहत में हम बहुत कुछ खोते जा रहे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है। इसका क्या उपाय है।

हम खुद से क्यों नहीं पूछते। रूपए पैसे का लालच, पैसे की भूख और हद से ज़्यादा की चाहत हमें ऐसा करने पर मजबूर कर रही है। ये सारी बातें अंततः हमें दुख और पछतावा ही पहुंचाती हैं। इससे परिवार बिखर रहे हैं। तनाव बढ़ रहा है और आपसी संबंध तो खराब हो ही रहे हैं सामाजिक तानाबाना भी  प्रभावित हो रहा है।

आखिर इसके पीछे का कारण क्या है। इसका समाधान क्या है। जब हम शांत मन से ध्यान लगाते हुए ईश्वर को स्मरण करते हैं और अवसाद छोड़कर केवल शांति का अनुभव करते हैं तब हमें इसका समाधान मिलता है। दरअसल हम सबकुछ पाना चाहते हैं उसकी चाहत में हम थोड़े कुछ को लेते हैं और वही थोड़ा कुछ हमसे सबकुछ छिन लेता है। हम अपनों पर विश्वास ही नहीं कर पाते। करेंगे भी कैसे आखिर हम खुद पर ही विश्वास करना भूल चुके हैं। इसका समाधान हम इन बातों से कर सकते हैं। 

संतुष्ट रहें मस्त रहें - यदि हम अपनी आमदनी से अपनी क्षमताओं से और अपने संसाधनों से संतुष्ट होते हैं तो हमें अधिक की लालसा नहीं होती ऐसे में हम उन्हें पाने के लिए कोई गलत प्रयास नहीं करते हैं। संतुष्टी हमें सुख और सुकून देती है। असंतुष्टी हमें लालच देती है। 

खुश रहें दुरूस्त रहें - कहते हैं सच्ची मुस्कान एक विटामिन की तरह है। यदि हम प्रसन्न हैं तो हम हर कार्य को बेहतर तरीके से कर सकते हैं। हम खुश रहते हैं तो दूसरों को भी खुश रखते हैं। 

दूसरों से तुलना न करें - जब कभी भी हम दूसरों की सुख सुविधाओ को देखते हैं तो हम दुखी हो जाते हैं। दूसरों को देखकर हम अपनी तुलना नहीं कर सकते। हमे यह सोचना चाहिए कि जो भी हमें मिला है वह काफी है और इसके लिए हम भगवान को धन्यवाद दें। 

निंदा न करें - जब हम किसी की निंदा करते हैं तो हमें उसके दोष ही दिखते हैं। ऐसे में हमारा मन व्यर्थ ही उसके दोषों को देखने में ज़ाया हो जाता है यही नहीं इससे हम केवल बुराई के बारे में ही सोचते रहते हैं। 

परिवार को प्राथमिकता दें - अपने परिवार और सहयोगियों को प्राथमिकता दें। उनके साथ समय बिताऐं। उनसे चर्चा करें और कोई परेशानी या गतिरोध हो तो उसे चर्चा कर हल करें। मगर ध्यान रखें चर्चा बिना क्रोध और चिड़चिड़ाहट भरे माहौल में हो। अपने साथी को समझें और उन्हें आपको समझने के लिए समय दें। परिवार के सदस्यों से अपनापन रखें। 

योग - ध्यान करें - प्रतिदिन कुछ समय योग और ध्यान के लिए देते हुए ईश्वर को धन्यवाद दें। ध्यान आपकी आंतरिक ऊर्जा को बढ़ाता है। यही नहीं यह आपको आत्म मंथन करने का सही अवसर देता है। इससे आप में सरकारात्मकता का विकास होता है। इसके साथ आप अपने से अभाव में जीवन जी रहे लोगों को देखें और उनके अभावों को दूर करने का प्रयास करें मगर ध्यान रहे जितनी शक्ति आपमें उनके अभावों को दूर करने की है उतनी ही शक्ति लगाऐं। जितना आपसे बन सकता है उतना ही करें उससे ज़्यादा न तो आप कर सकते हैं और न ही आप करें। ऐसे में आप को खुशी मिलेगी और आपके लिए इससे बढ़कर कुछ और नहीं होगा। 

 

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