किस तरह हुई थी यूरोपियन डे ऑफ़ लैंग्वेज की शुरुआत

अभी इसी माह 14 तारीख को 'हिन्दी दिवस’ सेलिब्रेट किया गया था। हर साल सेलिब्रेट किया जाता है। लेकिन हर बार हिन्दी के प्रसार के लिए होने वाले सार्थक प्रयासों की जगह भाषायी विवाद अधिक सुर्ख़ियां बटोरते हैं। इस बार भी यही हुआ। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी का बयान 'हिन्दी दिवस’ के अवसर पर पूरे दिन चर्चा में रहा'। उन्होंने बोला था, 'हिन्दी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। हो भी नहीं सकती।' दक्षिण इंडिया के किसी राजनेता द्वारा हिन्दी पर की गई ऐसी टिप्पणी कोई नई बात नहीं थी। वहाँ दशकों से हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने-बताने की हर कोशिश का विरोध होता हुआ आया है। पर दुखद ये कि ऐसे विरोध के बावजूद हम आज तक किसी भाषायी समाधान पर नहीं पहुंच चुके है। हालांकि पहुंचना चाहें तो यूरोपीय भाषा दिवस (European Day of Languages) हमें इसका रास्ता  दिखा दिया है।'

‘यूरोपीय भाषा दिवस’ (European Languages Day)। भाषायी सरोकार रखने वालों से अपेक्षा की जा सकती है कि वे इससे परिचित भी हो चुके है। लेकिन संभव है, बहुत लोग इस आयोजन के बारे में अधिक न जानते हों। इसीलिए संक्षेप में यह बताना जरूरी आवश्यक हो जाता है कि वर्ष  2001 से हर वर्ष 26 सितंबर को यह आयोजन किया जाता है। इससे जुड़ी एक वेबसाइट है-  https://edl।ecml।at/  , जिस पर आयोजन से जुड़ी तमाम सूचना मुहैया करावाई गई है । पहले पन्ने इसकी शुरुआती परिचय ही बड़ा दिलचस्प है और एक तरह से हमारी आंखें भी खोल रहा है। इसके अनुसार, 'पूरे यूरोप के 47 सदस्य देशों में 80 करोड़ से अधिक लोग रह रहे है। यह आयोजन उन्हें उनकी पढ़ाई, लिखाई के साथ-साथ किसी भी आयु में अधिक से अधिक भाषाएं सीखने के लिए प्रोत्साहित करने का प्रयास किया गया। यूरोपीय परिषद पूरी दृढ़ता से इस बात को मानती है कि भाषायी विविधता अंतर-सांस्कृतिक समझ और संबंध बढ़ाने का सबसे बड़ा माध्यम है। हमारे महाद्वीप की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का मूल तत्त्व है। इसीलिए यूरोपीय परिषद पूरे यूरोप में ‘बहुभाषावाद’ को प्रोत्साहित कर रही है।'

इसमें इसी तरह की अन्य कई दिलचस्प जानकारियां हैं। तथ्य हैं। अलबत्ता, हम ऊपर बताए गए महज इन तीन तथ्यों से ही यहां अपने भाषायी-विवाद का हल देख पाएंगे। जिसके लिए पहले तथ्य पर फिर निगाह दाल रहे है। यूरोप की तरह इंडिया, भारतीय उपमहाद्वीप भी ‘भाषायी विविधता’ वाला इलाके है। साथ ही सांस्कृतिक रूप से उतना ही समृद्ध भी। बल्कि उससे कुछ ज्यादा ही। इसीलिए किसी ‘एक भाषा दिवस’ (भले वह हिन्दी ही क्यों न हों) के आयोजन, उसके प्रोत्साहन और प्रसार की पहल यहां कारगर नहीं होने वाली। उम्मीद भी नहीं की जा सकती। बेहतर है, जिस तरह यूरोपीय परिषद ने इस तथ्यात्मक वास्तविकता को स्वीकार किया, हम भी करें। ‘हिन्दी दिवस’ के बजाय ‘भाषा दिवस’ मनाएं। बहुभाषावाद को प्रोत्साहित करना शुरू कर दें।

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