कुर्बानी के साथ देश भर में मनाया जा रहा है ईद-उल-अजहा पर्व

Sep 25 2015 11:28 AM
कुर्बानी के साथ देश भर में मनाया जा रहा है ईद-उल-अजहा पर्व

नई दिल्ली : भारत में आज हर कहीं कुर्बानी और दान का त्यौहार ईद-उल-अजहा मनाया जा रहा है। बकरीद के अवसर पर देशभर के मुस्लिम समुदाय प्रातः से ही नमाज़ अता कर इस पर्व को मनाने में लगे हैं। मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा नमाज़ अता कर कुर्बानी दी जा रही है। इस दौरान सभी अपने मित्रों रिश्तेदारों से मिलने पहुंचेंगे। मामले में यह बात सामने आई है कि बाजारों में बकरीद का उल्लास देखने को मिल रहा है। मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा बाजार में बकरों की खरीदी की गई।

बड़े उत्साह से बाजार में बकरे खरीदे गए। यही नहीं यह बात भी सामने आई है कि इस दौरान हृष्ट-पुष्ट बकरों की अधिक मांग रही। इन बकरों को बाजार में विशेषतौर पर बेचा गया। बाजार में बकर के मालिकों ने अपने बकरों को खूब खिलाई पिलाई करने के बाद बेचा। बकरों को हलाल कर मुस्लिम धर्मावलंबियों ने ईद-उल-अजहा का पर्व मनाया। यह पर्व सुबह से ही मनाया जा रहा है दिन चढ़ने के साथ पर्व मनाने में तेजी आएगी। 

कुर्बानी का पर्व ईद-उल-जुहा को अल्लाह को पाने का सबसे सशक्त हथियार है। हिंदू धर्म में कुर्बानी को त्याग से जोड़कर देखा जाता है। मुस्लिम धर्म में कुर्बानी का आशय है स्वयं को खुदा के नाम पर कुर्बान कर देना अर्थात् कुछ त्याग देना। मुस्लिम धर्म का महत्वपूर्ण पर्व ईद - उल - जुहा बकरीद के नाम से अधिक लोकप्रिय है। हजरत इब्राहिम द्वारा अल्लाह के हुक्म पर बेटे की कुर्बानी देने के लिए हम सैदव तैयार रहते हें।

वे अल्लाह के बेहद करीब रहते हैं। दरअसल माना जाता है कि अल्लाह ने हजरत इब्राहिम की परीक्षा ली। इसे लिए उन्होंने उनसे अपनी सबसे प्यारी चीज़ कुर्बान करने के लिए कहा। हजरत इब्राहिम को ऐसा अहसास हुआ कि उनका सबसे प्रिय तो उनका पुत्र ही है। उन्होंने अपने बेटे की बलि देने की बात स्वीकार की है। कुर्बानी देते समय उनकी भावनाऐं आड़े आ सकती हैं। जिसके लिए उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली।

इस दौरान जब कुर्बानी देने के बाद उन्होंने अपनी पट्टी हटाई तो उनके सामने उनका पुत्र जीवित अवस्था में खड़ा था। दूसरी ओर बेदी पर एक मेमना कटा पड़ा था। यह कहा गया कि इस मौके पर कई तरह की रस्में निभाई जाती हैं। विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं। कुर्बानी के लिए यह नियम है कि बकरे का कोई भी अंग कटा हुआ नहीं होना चाहिए। उसके बदन का कोई भी हिस्सा कटा हुआ नहीं होना चाहिए। जब बकरा हलाल हो जाता है तो उस गोश्त को हलाल कहा जाता है। इस गोश्त के तीन हिस्से किए जाते हैं। एक हिस्सा स्वयं के लिए एक दोस्तों के लिए और रिश्तेदारों के लिए इसके बाद तीसरा हिस्सा गरीबों और मिस्कीनों के लिए दिया जाता है। इस त्यौहार पर गरीबों में पैसा दान के तौर पर बांटा जाता है।