यहाँ दुर्गा पूजा में पीते है शराब, खाते है चिकन

जी हाँ अब आप सोच रहे होंगे की आखिर ऐसा कहाँ होता है और ऐसा करना तो अशुभ होगा लेकिन कोयलांचल धनबाद के तोपचांची पहाड़ के पास बसे चलकरी बस्ती में रहने आदिम जनजाति बिरहोर इन दिनों कई समस्याओं से जूझ रहे हैं। जहां रोजगार और स्वास्थ्य की बदहाली इनके तरक्की के मार्ग में बाधक बनी हुई है। जन्म-विवाह से लेकर मेहमान नवाजी और दुर्गापूजा में भी दारू (शराब) पीना परंपरा का हिस्सा बनी हुई है. यहां तक की सजा में भी दारू मुर्गा देना पड़ता है।

आमदनी का कोई साधन नहीं - धनबाद जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित तोपचांची चलकरी बस्ती में आदिम जनजाति बिरहोर के 250 परिवार बसे हैं, लेकिन इनके पास नकद आमदनी का कोई साधन नहीं है। ये रस्सी और टोकड़ी बनाकर किसी तरह जीवन यापन करते हैं, बिरहोरो में यदि कोई बीमार पड़ जाए तो दवा और ईलाज कराने तक के पैसे नहीं हैं। चलकारी में बिरहोरों के प्रधान शूकर बिरहोर पिछले तीन दिनों से बुखार से पीड़ित हैं. पैसे के अभाव में जांच और ईलाज नहीं करा पा रहे हैं।

बिरहोर के प्रति जिला प्रशासन लापरवाह - दिलचस्प बात ये है कि दुर्गापुजा त्योहार हो या कोई और जश्न का मौका हड़िया दारू पीने का रिवाज है। यहां तक की परंपरा के मुताबिक किसी गलती पर सजा भी दारू-मुर्गा ही है. वृद्धा पेंशन, रोजगार और वन पट्टा सहित कई समस्याओं को लेकर बिरहोर पिछले नौ अक्‍टूबर को धनबाद उपायुक्त कृपानन्द झा से मिलने समहरणलाय पहुंचे थे।

10 दिन बीत जाने के बाद भी उपायुक्त उनकी दुर्दशा देखने नहीं पहुंचे। आदिम जनजाति बिरहोर के कल्याण और संरक्षण के लिए सरकार ने कई तरह की योजनाएं बनाई है. हर साल करोड़ों खर्च कर रही है, लेकिन हकीकत में उन तक कितना पहुंच रहा है, ये धनबाद के चलकरी बिरहोर बस्ती के हाल से समझा जा सकता है।

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