धर्मस्थलों पर महिलाओं के प्रवेश पर उठता विवाद और बदले - बदले से मायने

Jan 13 2016 08:15 PM
धर्मस्थलों पर महिलाओं के प्रवेश पर उठता विवाद और बदले - बदले से मायने

भारत धार्मिक मान्यताओं में रचा बसा देश है। भारत को लेकर कहा जाता है कि यहां करीब हर पांच कोस की दूरी पर भाषा, मान्यता और रहन - सहन बदल जाता है। ऐसे ही देश में कई पौराणिक मंदिर प्रतिष्ठापित हैं। इन मंदिरों में हर दिन हजारों दर्शनार्थी दर्शन करने पहुंचते हैं। मंदिर भी अत्यंत प्राचीन हैं। जहां दर्शन, पूजन पद्धतियों की अपनी - अपनी मान्यताऐं हैं लेकिन वक्त बदलने के साथ ये मान्यताऐं बदलती जा रही हैं। मगर कुछ मान्यताऐं विवादों के चलते सुर्खियों में रहती हैं। ऐसी ही मान्यताओं में शामिल है। मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश और उनके पूजन - अर्चन की बात। 

जी हां, आधुनिक दौर में यह बड़ा तेजी से हुआ। जिस तरह से महिलाओं की भागीदारी हर क्षेत्र में बढ़ गई है वहीं अब महिलाऐं इस तरह की मान्यताओं को मानने में अधिक विश्वास नहीं रखती हैं। इसे दकियानूसी कहा जाने लगा है। ऐसा ही कुछ विरोधी दर्शन महाराष्ट्र राज्य के शनि शिंगणापुर मंदिर में और केरल के तिरूमाला मंदिर में देखने को मिला। यहां पर जब महिलाओं को प्रवेश देने पर विरोध किया गया तो महिलाऐं विरोध में आकर खड़ी हो गईं। 

हालांकि दोनों ही मंदिरों की मान्यताऐं अलग हैं और दोनों ही मंदिरों में वाकये अलग हुए। शनि मंदिर में एक महिला श्री शनि देव की शिला के पास पहुंची और फिर शिला पर ही तेल चढ़ा दिया। मगर इस बात का कुछ धार्मिक लोगों ने विरोध किया और महिलाओं का संगठन विरोध में खड़ा हो गया। हालांकि न्यासियों ने मामले को शांत करने के लिए न्यास मंडल में दो महिलाओं को सदस्य बना दिया लेकिन धार्मिक मान्यताऐं वैसी ही रहीं।

हां महिला संगठनों का विरोध अभी भी जारी है। केरल के तिरूमाला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश नहीं दिया गया। कहा गया कि महिलाऐं मासिक धर्म के समय मंदिरों में नहीं जाती लेकिन वर्तमान दौर में महिलाऐं इस नियम का कड़ाई से पालन नहीं करती हैं इसलिए महिलाओं को प्रवेश नहीं दिया जा सकता। हालांकि इस विषय पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में यह कहा है कि किसी धार्मिक मान्यता के अलावा इस तरह के नियमों को मान्य नहीं किया जा सकता है।

दूसरी ओर उज्जैन के लोकप्रिय ज्योर्तिलिंग श्री महाकालेश्वर में तड़के होने वाली भस्मारती में महिलाओं को भस्म आरती देखने की अनुमति नहीं होती है। हालांकि इसके पीछे पौराणिक कारण बताए जाते हैं। महिलाओं को नंदी हाॅल में प्रवेश दे दिया जाता है जहां से वे भगवान का मनन कर सकती हैं और भस्म आरती में भस्म रमाने के पहले के दर्शन कर सकती हैं। हालांकि इस विषय में किसी को कोई आपत्ती भी नहीं है। मगर यह कौतूहल का विषय जरूर बना हुआ है।

अलग - अलग मंदिरों में महिलाओं को धार्मिक अधिकार दिए जाने की उठती मांग बदलते समय में उठने लगी है। इसका सबसे ज़्यादा विरोध पुरूष प्रधान पंडित समुदाय कर रहा है। इसके पीछे वे अभी तक तो धार्मिक कारण ही गिना रहे हैं। मगर महिलाओं द्वारा भी अपना पक्ष सामने रखा गया है और महिला अधिकारों की बात कही जा रही है।

एक बात यह भी सामने आ रही है कि महिलाओं को एक बार मंदिर में प्रवेश का रास्ता मिल गया तो वे पुरूषों के पूजन - अर्चन, पांडित्य और अन्य अधिकारों का अतिक्रमण भी कर सकती हैं। ऐसे में पुरूषवादी मान्यताऐं महिलाओं को प्रवेश से वंचित करना चाहती है। हालांकि समय बदलने के बाद भी धार्मिक मान्यता बनाम आधुनिकता का विवाद अभी भी जारी है। 

'लव गडकरी'