मात्र 2 वर्ष की आयु में सीखना शुरू किया संगीत, मिला कला क्षेत्र का सबसे बड़ा सम्मान

Jun 18 2019 12:00 AM
मात्र 2 वर्ष की आयु में सीखना शुरू किया संगीत, मिला कला क्षेत्र का सबसे बड़ा सम्मान

उस्ताद अली अक़बर ख़ाँ भारतीय शास्त्रीय संगीतज्ञ और सरोद वादक थे, वे मैहर घराने से संबंध रखते थे। उनकी विश्वव्यापी संगीत प्रस्तुतियों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत तथा सरोद वादन को लोकप्रिय बनाने में अहम् भूमिका अदा की थी। 14 अप्रैल 1922 को अली अक़बर ख़ाँ का जन्म मौजूदा बांग्लादेश में स्थित कोमिला ज़िले के शिबपुर गाँव में "बाबा" अलाउद्दीन खाँ और मदीना बेगम के घर में हुआ था।

उस्ताद अली अकबर ख़ाँ ने अपनी गायन तथा वादन की शिक्षा लेना अपने पिता से दो वर्ष की आयु में शुरू की थी। इन्होंने अपने चाचा, फ़कीर अफ़्ताबुद्दीन से तबला भी सीखा। उस्ताद अल्लाउद्दीन खाँ ने इन्हें कई अन्य वाद्यों मे भी माहिर बनाया, पर अन्तत: इन्होने निश्चय किया कि इन्हें सरोद पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए। कई सालों के कठिन प्रशिक्षण के बाद इन्होने अपनी पहली पेशकश तक़रीबन 13 वर्ष की आयु में दी। 22 वर्ष की उम्र में वे जोधपुर राज्य के दरबारी संगीतकार बन गए।

खाँ साहब को 1988 में भारत के सर्वोच्च पुरस्कारों में से एक पद्म विभूषण से नवाज़ा गया। इसके अतिरिक्त भी उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। 1997 में उस्ताद अली अकबर ख़ाँ को संयुक्त राज्य अमेरिका का कला के क्षेत्र में सबसे ऊँचा सम्मान नेशनल हैरिटेज फ़ेलोशिप दी गई। 1991 में उन्हें मैकआर्थर जीनियस ग्रांट से नवाज़ा गया। खाँ साहब को कई ग्रामी पुरस्कारों के लिये भी नामित किया गया। फिर भी, खाँ साहब अपने पिता द्वारा दी गई "स्वर सम्राट" की पदवी को बाकी सभी सम्मानों से ऊँचा मानते हैं। 88 वर्ष की आयु में 18 जून 2009 को सेन फ्रांसिस्को, संयुक्त राज्य अमेरिका में उनका देहांत हो गया। वे लम्बे समय से किडनी की बीमारी से जूझ रहे थे।

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