बीफ बैन के बाद भी प्रभावित हो रहा है गौवंश

Sep 23 2015 06:16 PM
बीफ बैन के बाद भी प्रभावित हो रहा है गौवंश

इन दिनों देश में एक बहस जोरों से चल रही है आखिर क्या खाऐं और क्या न खाऐं इस पर सलाहें दी जा रही हैं। देश के सारे मसले - मुद्दे छोड़कर बीफ और मीट पर बैन लगाने की मांग हो रही है तो कुछ नेता इसके विरोध में उतर आए हैं। हालात ये हैं कि यह मसला शांत होने का नाम ही नहीं ले रहा है। गौ माता की चिंता करने वाले गौ संरक्षण की बात करते हुए सड़कों पर उतर आए हैं लेकिन उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि एक हृष्ट - पुष्ट गाय को जिंदा लाश बनाने का हर रोज़ प्रयास किया जाता है। वह भी अपने ही फायदे के लिए। गौ - संरक्षण की बात करने वाले गौपालक बीफ खाने वालों से कम दोषी नहीं है।

इस बात पर विचार किया जाए तो एक गंभीर प्रश्न हमारे दिल को झकझोर देता है। जिस भारतीय संस्कृति में गाय को माता कहा गया है। जो संस्कृति हमें इस बात का संदेश देती है कि यदि हम प्रकृति से कुछ लें तो उसकी दुगनी तुलना में उसे कुछ प्रदान भी करें। मगर वर्तमान में हम भौतिकवाद की अंधी दौड़ में इस कदर दौड़ते जा रहे हैं कि हमें केवल अपना लाभ ही नज़र आ रहा है।

हम यह नहीं जानते कि इस दौड़ में हम आखिर कहीं नहीं पहुंचेंगे। हाथ आएगी तो बस निराशा और फिर हमें उसी ओर लौटना होगा। जी हां, यह बिल्कुल सत्य है। गायों को दूध दोहने के लिए गौपालकों द्वारा वर्षों से उपयोग में लाया जा रहा है। मगर इन गायों से अधिक से अधिक दूध दोहने की चाहत में इनके स्वास्थ्य और जीवन के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। जो गौपालक गाय माता और गौ मांस पर पाबंदी लगाने की बात करते हैं वे ही गौवंश के दुश्मन बने हुए हैं। गाय का दूध अधिक से अधिक मात्रा में प्राप्त करने के लिए गायों को खतरनाक माने जाने वाले आॅक्सीटोक्सीन के इंजेक्शन लगाए जाते हैं।

इन इंजेक्शनों के घातक प्रयोग से गाय असमय कमजोर हो जाती है और उसकी प्रजनन क्षमता भी प्रभावित होती है। आॅक्सीटाॅक्सीन के प्रभाव से दुहे गए दूध की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। ऐसे में गौवंश और गायों की नस्लों का जीवन संकट में आता जा रहा है। मगर इस ओर अधिक ध्यान नहीं दिया जा रहा।

दूसरी ओर कई सरकारों द्वारा पोलिथन पर प्रतिबंध लगाने के बाद भी इनका जमकर प्रयोग किया जाता है। देश में अपशिष्ट निपटान एक बड़ी समस्या है। यह पोलिथिन की थैलियां दूषित या खराब भोज्य पदार्थों के साथ कचरा पेटियों या फिर ऐसे स्थानों पर डाल दी जाती हैं जहां किसी काॅलोनी का कचरा एकत्रित होता है।

गौपालकों द्वारा अपने धन को बचाने के चक्कर में इन गायों को खुला छोड़ दिया जाता है। जिससे ये स्वच्छंद चरती रहें और गौपालकों को इनके लिए चारे का अतिरिक्त प्रबंध न करना पड़े। मगर पोलिथन की थैलियों में लिपटे भोज्य पदार्थ को जब गाय ग्रहण करती हैं तो उनके गले में यह पोलिथिन जमा हो जाती है। जो कि उनके श्वसन तंत्र को जाम कर देती है ऐसे में इन गायों की मौत हो जाती है। गौवंश संरक्षण की बात करने वाले ही गायों के जीवन से इस तरह का खिलवाड़ कर रहे हैं। जिस तेजी से गौवंश कट रहा है उसी तरह से गायें असमय बीमार हो रही हैं। आवश्यकता से अधिक दूध प्राप्त करने के एवज में गायों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ किया जा रहा है। 

'लव गडकरी'