नवरात्रि: सबसे अद्भुत और चमत्कारी है मां छिन्नमस्तिका सिद्धपीठ, जानिए रोचक बातें

चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व चल रहा है जो नौ दिनों तक मनाया जाने वाला पर्व है। इस पर्व के तीसरे दिन आज हम आपको बताने जा रहे हैं दुनिया के दूसरे सबसे बड़े शक्तिपीठ मां छिन्नमस्तिका मंदिर के बारे में। झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर मां छिन्नमस्तिके का यह मंदिर है। आप सभी को बता दें कि यह मंदिर रजरप्पा के भैरवी-भेड़ा और दामोदर नदी के संगम पर स्थित है और यहाँ हर साल लाखों की संख्या में भक्त जयकारे लगाते हुए पहुँचते हैं।

आपको बता दें कि असम के कामाख्या मंदिर के बाद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े शक्तिपीठ के रूप में विख्यात मां छिन्नमस्तिके मंदिर सबसे अधिक महत्वपूर्ण और लोकप्रिय माना जाता है। छिन्नमस्तिके मंदिर के अलावा आपको यहां महाकाली मंदिर, सूर्य मंदिर, दस महाविद्या मंदिर, बाबाधाम मंदिर, बजरंग बली मंदिर, शंकर मंदिर और विराट रूप मंदिर मिलेंगे। यह सभी कुल 7 मंदिर हैं और यहाँ पश्चिम दिशा से दामोदर तथा दक्षिण दिशा से कल-कल करती भैरवी नदी का दामोदर में मिलना मंदिर की खूबसूरती को बढ़ाने का कार्य करता है।

इसके अलावा मंदिर की उत्तरी दीवार भी बहुत रोचक है क्योंकि यहाँ रखे एक शिलाखंड पर दक्षिण की ओर मुख किए माता छिन्नमस्तिके का दिव्य रूप अंकित है। कब बना था मंदिर- कई लोगों का मत है कि मंदिर का निर्माण 6,000 वर्ष पहले हुआ था, वहीँ कई लोग इसे महाभारत युग का मानते है। आपको बता दें कि यह मंदिर में प्रातःकाल 4 बजे सजना शुरू होता है और भक्तों की भीड़ भी सुबह से पंक्तिबद्ध खड़ी रहती है। यहाँ शादी-विवाह, मुंडन-उपनयन के लगन और दशहरे के मौके पर भक्तों की 3-4 किलोमीटर लंबी लाइन लग जाती है। इसके अलावा इस मंदिर के आसपास ही फल-फूल, प्रसाद की कई छोटी-छोटी दुकानें हैं।

कैसा है माँ का स्वरूप- आप सभी को बता दें कि मां छिन्नमस्तिके मंदिर के अंदर स्थित शिलाखंड में मां की 3 आंखें हैं। वहीँ बायां पांव आगे की ओर बढ़ाए हुए वे कमल पुष्प पर खड़ी हैं। इसी के साथ पांव के नीचे विपरीत रति मुद्रा में कामदेव और रति शयनावस्था में हैं। मां छिन्नमस्तिके का गला सर्पमाला तथा मुंडमाल से सुशोभित है। बिखरे और खुले केश, जिह्वा बाहर, आभूषणों से सुसज्जित मां नग्नावस्था में दिव्य रूप में हैं। उनके दाएं हाथ में तलवार तथा बाएं हाथ में अपना ही कटा मस्तक है। इसी के साथ उनके अगल-बगल डाकिनी और शाकिनी खड़ी हैं जिन्हें वे रक्तपान करा रही हैं और स्वयं भी रक्तपान कर रही हैं। उनके गले से रक्त की 3 धाराएं बह रही हैं।

कैसा है मंदिर- मंदिर का मुख्य द्वार पूरबमुखी है। वहीँ इस मंदिर के सामने बलि का स्थान है। आपको बता दें कि बलि स्थान पर प्रतिदिन औसतन 100-200 बकरों की बलि चढ़ाई जाती है। इस मंदिर की ओर मुंडन कुंड है और इसके दक्षिण में एक सुंदर निकेतन है जिसके पूर्व में भैरवी नदी के तट पर खुले आसमान के नीचे एक बरामदा है। इस मंदिर के पश्चिम भाग में भंडारगृह है और रुद्र भैरव मंदिर के नजदीक एक कुंड है। मंदिर की भित्ति 18 फुट नीचे से खड़ी की गई है। कहा जाता है नदियों के संगम के मध्य में एक अद्भुत पापनाशिनी कुंड है, जो रोगग्रस्त भक्तों को रोगमुक्त कर उनमें नवजीवन का संचार करता है। केवल यही नहीं बल्कि यहां मुंडन कुंड, चेताल के समीप ईशान कोण का यज्ञ कुंड, वायु कोण कुंड, अग्निकोण कुंड जैसे कई कुंड हैं।

मां छिन्नमस्तिके की महिमा की पौराणिक कथा- प्राचीनकाल में छोटा नागपुर में रज नामक एक राजा राज करते थे। राजा की पत्नी का नाम रूपमा था। इन्हीं दोनों के नाम से इस स्थान का नाम रजरूपमा पड़ा, जो बाद में रजरप्पा हो गया। एक कथा के अनुसार एक बार पूर्णिमा की रात में शिकार की खोज में राजा दामोदर और भैरवी नदी के संगम स्थल पर पहुंचे। रात्रि विश्राम के दौरान राजा ने स्वप्न में लाल वस्त्र धारण किए तेज मुख मंडल वाली एक कन्या देखी। उसने राजा से कहा- हे राजन, इस आयु में संतान न होने से तेरा जीवन सूना लग रहा है। मेरी आज्ञा मानोगे तो रानी की गोद भर जाएगी। राजा की आंखें खुलीं तो वे इधर-उधर भटकने लगे। इस बीच उनकी आंखें स्वप्न में दिखी कन्या से जा मिलीं। वह कन्या जल के भीतर से राजा के सामने प्रकट हुई। उसका रूप अलौकिक था। यह देख राजा भयभीत हो उठे। राजा को देखकर देख वह कन्या कहने लगी- हे राजन, मैं छिन्नमस्तिके देवी हूं। कलियुग के मनुष्य मुझे नहीं जान सके हैं जबकि मैं इस वन में प्राचीनकाल से गुप्त रूप से निवास कर रही हूं। मैं तुम्हें वरदान देती हूं कि आज से ठीक नौवें महीने तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी। देवी बोली- हे राजन, मिलन स्थल के समीप तुम्हें मेरा एक मंदिर दिखाई देगा। इस मंदिर के अंदर शिलाखंड पर मेरी प्रतिमा अंकित दिखेगी। तुम सुबह मेरी पूजा कर बलि चढ़ाओ। ऐसा कहकर छिन्नमस्तिके अंतर्ध्यान हो गईं। इसके बाद से ही यह पवित्र तीर्थ रजरप्पा के रूप में विख्यात हो गया।

अन्य कथा- एक बार भगवती भवानी अपनी सहेलियों जया और विजया के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने गईं। स्नान करने के बाद भूख से उनका शरीर काला पड़ गया। सहेलियों ने भी भोजन मांगा। देवी ने उनसे कुछ प्रतीक्षा करने को कहा। बाद में सहेलियों के विनम्र आग्रह पर उन्होंने दोनों की भूख मिटाने के लिए अपना सिर काट लिया। कटा सिर देवी के हाथों में आ गिरा व गले से 3 धाराएं निकलीं। वह 2 धाराओं को अपनी सहेलियों की ओर प्रवाहित करने लगीं। तभी से ये छिन्नमस्तिके कही जाने लगी।

कैसे पहुँच सकते हैं- झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर मां छिन्नमस्तिके मंदिर के पास ही में ठहरने की उत्तम व्यवस्था है। मंदिर तक जाने के लिए पक्की सड़क है और सुबह से शाम तक मंदिर पहुंचने के लिए बस, टैक्सियां एवं ट्रैकर उपलब्ध हैं।

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