भारतीय कुम्हारों की अंधियारी दिवाली

दीवाली भारत का सबसे बड़ा पर्व है. दीपोत्सव का यह त्यौहार सभी प्रान्तों में, हर वर्ग में बड़े उत्साह से मनाया जाता है. हर घर में और मंदिरों में घी के दीपक जलाए जाते हैं. घर के बाहर बड़े कंडील जलाये जाते हैं. रंगबिरंगी रौशनी की झिलमिल करती हुई लडियां लगाईं जाती है. आजकल मार्केट में एक से एक इलेक्ट्रिक झालर उपलब्ध है. और ख़ास तौर पर चाइना से आई हुई सस्ती झालरों और दीयों से मार्केट अटा पडा है.

दिवाली वह त्यौहार है जिससे मिटटी के दीये बनाने वाले कुम्हारों के यहाँ साल भर में इसी समय थोड़ी ज्यादा कमाई हाथ आती है. उन्हीं के हाथो से बनाए दीयों से हमारा घर रोशन होता आया है.पर चीन के दीये और झालरों से भारतीय कुम्हारों को ख़ासा नुक्सान हुआ है. लोग सस्ते के चक्कर में इन दीयों और झालरों से घर को सजाते हैं और घी के 3-4 दीये शगुन के जला लेते है. ऐसे में भारतीय कुम्हारों की दीवाली काली हो गई है.

दरअसल दिवाली पर भारत का मार्केट चाइना के लिए कमाई का बड़ा अवसर बन जाता है और वो सस्ते दाम में अपने दीये और झालर मार्केट में उतार देता है. किफायती दरो में ज्यादा रोशनी के कारण लोग पारंपरिक दीयों पर इन चायनीज़ दीयों को तज़रीह देते हैं,जिससे भारतीय कुम्हारों का मिटटी के दीये का व्यापार मिटटी में मिल गया है. पर भारतीयों के चाइना माल के बहिष्कार से इनके लिए अँधेरे में रौशनी का एक दीया ज़रूर जला है.

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