स्वर्ण पदक अपने नाम रखने वाला खिलाडी दिहाड़ी करने को हुआ मजबूर

Aug 01 2020 03:08 PM
स्वर्ण पदक अपने नाम रखने वाला खिलाडी दिहाड़ी करने को हुआ मजबूर

बीते कुछ दिनों में देश में कई तरह के परिवर्तन हुए है. वही इस बीच एक संगरूर कहानी है एक ऐसे प्लेयर की जिसने बॉक्सिंग रिंग में तो विरोधियों को पटखनी दी, किन्तु जिंदगी के रिंग में गरीबी को नहीं हरा पाया. संगरूर के रहवासी 27 वर्षीय मुक्केबाज मनोज कुमार अब 450 रुपये में पल्लेदारी का काम कर रहे हैं. जिन हाथों में मुक्केबाजी के दस्ताने होने चाहिए थे, वह अब गेहूं व चावल की बोरियां ढोने को मजबूर हैं.

वही गुमनामी में जी रहे, इस बॉक्सर की कहानी महज 11 साल की उम्र में ही आरम्भ हो गई थी. मनोज ने राज्य स्तर पर ही 23 पदक अपने नाम कर डाले. उन्होंने निरंतर 15 स्वर्ण पदक जीते. देखते ही देखते प्रथम जूनियर बॉक्सिंग, सीनियर बॉक्सिंग और यूथ बॉक्सिंग के पश्चात् आमंत्रण टूर्नामेंट के लिए भारतीय दल में भी अपना स्थान बनाया. साथ ही राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा में स्वर्ण पदक और पांच कांस्य पदक अपने नाम करने वाले मनोज ने दैनिक जागरण से कहा, कि छठी कक्षा में प्रथम बार बनासर बाग में पीटी शो करने गया. 

तब वहां स्टेडियम में बॉक्सिंग रिंग व गलव्स देख खेलने का जुनून चढ़ गया. घर पर ही प्रैक्टिस आरम्भ किया, और कोच पुष्पिंदर से कोचिंग ली. वही मस्तुआना साहिब के बाक्सिंग केंद्र में स्वयं को तराशा, और पंजाब पुलिस, रेलवे डिपार्टमेंट के कई प्लेयर्स को रिंग में मात दी. पता ही नहीं चला कि कब राष्ट्रीय स्तर पर खेलने लगा, किन्तु शायद गरीबी और किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. कहते है न किस्मत के आगे किसी की भी नहीं चलती है. ठीक उसी तरह इस प्लेयर की किस्मत ने भी इनका साथ नहीं दिया.

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