मैथिलीशरण गुप्त, जिन्हे महात्मा गाँधी ने दी थी 'राष्ट्रकवि' की उपाधि

Aug 03 2019 12:01 AM
मैथिलीशरण गुप्त, जिन्हे महात्मा गाँधी ने दी थी 'राष्ट्रकवि' की उपाधि

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त 1886 ही हुआ था। हिन्दी साहित्य के इतिहास में वे खड़ी बोली के पहले महत्त्वपूर्ण कवि माने जाते हैं। उन्हें साहित्य जगत में 'दद्दा' नाम से पुकारा जाता था। उनकी कृति भारत-भारती (1912) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान काफी प्रभावशाली सिद्ध हुई थी और और इसी वजह से महात्मा गांधी ने उन्हें 'राष्ट्रकवि' की पदवी भी दी थी। उनकी जयन्ती ३ अगस्त को प्रतिवर्ष  'कवि दिवस' के रूप में मनाया जाता है। सन 1954 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से नवाज़ा गया।

उनके प्रथम काव्य संग्रह के रूप में "रंग में भंग" तथा बाद में "जयद्रथ वध" प्रकाशित हुई। उन्होंने बंगाली के काव्य ग्रन्थ "मेघनाथ वध", "ब्रजांगना" का हिंदी में अनुवाद भी किया। सन् 1912 - 1913 में उन्होंने राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत "भारत भारती" का प्रकाशन किया। जिससे उनकी लोकप्रियता सर्वत्र फैल गई। इसके बाद उन्होंने संस्कृत के विख्यात ग्रन्थ "स्वप्नवासवदत्ता" का अनुवाद कर उसे प्रकाशित कराया। सन् 1916-17 में महाकाव्य 'साकेत' की रचना शुरू की। उर्मिला के प्रति उपेक्षा के भाव उन्होंने इस ग्रन्थ में दूर किए। इसके बाद उन्होंने  स्वतः प्रेस की स्थापना कर अपनी पुस्तकें खुद छापना शुरु किया। साकेत तथा पंचवटी आदि अन्य ग्रन्थ उन्होंने सन् 1931 में पूर्ण किए। इसी समय वे राष्ट्रपिता गांधी जी के सम्पर्क में आए। 

इसी साल प्रयाग में "सरस्वती" की स्वर्ण जयन्ती समारोह का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता गुप्त जी ने की। सन् 1963 में अनुज सियाराम शरण गुप्त के देहांत ने उन्हें अपूर्णनीय आघात पहुंचाया। 12 दिसम्बर 1964 को दिल का दौरा पड़ा और साहित्य का जगमगाता तारा सदा के लिए अस्त हो गया, किन्तु उनकी चमक आज भी उनकी कविताओं में नज़र आती है।

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