आखिर क्यों बकरीद को कहा जाता है कुर्बानी की ईद? जानिए इसका इतिहास

बकरीद अर्थात कुर्बानी की ईद। इसे ईद-उल-अजहा भी बोला गया है। ये ऐसा त्यौहार है जो अपने फर्ज के लिए कुर्बानी की भावना बताता है। इस वर्ष बकरीद का त्यौहार 21 जुलाई, बुधवार को मनाया जाएगा। 

बकरीद का इतिहास:-
हजरत इब्राहिम को अल्लाह ने आजमाइश का हुक्म दिया। उन्हें हुक्म प्राप्त हुआ कि वे अपनी सबसे प्यारी चीज को कुर्बान कर दें। हजरत समस्यां में पड़ गए। वे सोचने लगे कि आखिर उन्हें सबसे प्यार क्या है, जिसे वे कुर्बान करें। तभी उन्हें अपने बेटे हजरत इस्माइल का ध्यान आया। उन्होंने सोच लिया कि वे बेटे को ही कुर्बान करेंगे क्योंकि वे उससे बेहद प्रेम करते थे। वे अपने बेटे को कुर्बान करने निकल पड़े। उन्होंने आंखों पर पट्टी बांधी जिससे कुर्बानी के वक़्त उनके हाथ रुक न ठहरे। तथा कुर्बानी दे दी।

लेकिन जब उन्होंने पट्टी निकाली तो देखा कि उनके बेटे ठीक थे। रेत पर एक भेड़ कटा पड़ा था। कहा जाता हैं कि अल्लाह ने उनकी कुर्बानी की भावना से प्रसन्न होकर बेटे को जीवनदान दिया था। तभी से पशुओं की कुर्बानी को अल्लाह का हुक्म माना गया तथा बकरीद का त्यौहार मनाया जाने लगा। बकरीद के दिन लोग प्रातः शीघ्र उठकर नहाकर नए कपड़े पहने हैं। ईदगाह में ईद की नमाज अदा करते हैं। नमाज के पश्चात् एक-दूसरे से गले मिलते हैं। ईद की मुबारकबाद देते हैं। फिर पशुओं की कुर्बानी का सिलसिला आरम्भ हो जाता है।

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