कृतिम कार्निया जीवन मे लाये रोशनी

कृतिम कार्निया जीवन मे लाये रोशनी

हर साल भारत में करीब एक लाख से भी ज्यादा लोग इस इंतजार में रहते हैं कि उनकी आंखों की रोशनी के लिए कोई कार्निया डोनर मिल जाए। मगर यह संभव नहीं हो पाता। ऐसे कई लोग हैं,जो जन्मजात अंधापन या अनुवांशिक बीमारी के कारण अंधेरे में जी रहे हैं। ऐसे में सिर्फ एक ही विकल्प होता है 'कार्निया डोनर'। अगर किसी व्यक्ति को कार्निया डोनर मिल जाए तो ऐसी स्थिति में प्राकृतिक कार्निया को हटा कर नया कार्निया लगा दिया जाता हैं। कार्निया की कमी को देखते हुए वैज्ञानिकों ने कृत्रिम कार्निया बनाया। आर्टिफिशियल कार्निया को इस तरह बनाया गया है कि यह आंखों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता। न ही इसे लगाने के बाद आंखों में कोई संक्रमण का खतरा रहता है। 

इस कार्निया को पोलीमर कोशिकाओं से इस तरह बनाया गया है कि इसे आंखों में लगाने के बाद इस पर और किसी तरह की कोशिका उत्पन्न नहीं होती। इस कार्निया को पहली बार खरगोश की आंखों में लगाकर जांच की गई और नतीजा सफल निकला। अब इसे इंसान की आंखों पर भी लगाया जा रहा है। आर्टिफिशियल कार्निया को कुछ इस तरह बनाया गया है, जिससे यह आसानी से आंखों के आस-पास की कोशिकाओं से फिट बैठे। इनकी बनावट बिल्कुल असली कार्निया जैसी है और इसके किनारों पर प्रोटीन की खास परत बनाई जाती है, जो आंखों में लगने के बाद ऐसे काम करता है जैसे दरवाजे की सिटकनी काम करती है। 

इस वजह से कार्निया के किनारे बिल्कुल प्राकृतिक कार्निया से आसानी से मिल जाते हैं। कार्निया का बीच का हिस्सा कोशिकाओं से मुक्त रहता है जिस वजह से हम आसानी से देख पाते हैं। इस कार्निया की बाहरी हिस्सा हाइड्रोफिलिक पोलीमर होता है जो आंसू के द्रव्य से हमेशा नमी लेता रहता है। विशेषज्ञों की मानें तो यह कार्निया पूरी तरह से जांच कर बनाया जाता है ताकि यह आंखों के लिए पूरी तरह सुरक्षित हो।  असर लोग नेत्र-दान को गलत मानते हैं। कुछ लोग पुरानी मान्यताओं के कारण इसका विरोध करते हैं। पर समय के साथ लोगों की सोच बदली हैं। लोग अब स्वेच्छा से नेत्रदान के लिए आगे आ रहे हैं। मरणोपरांत लगभग छह घंटे के अंदर मृतक को डॉक्टर के पास ले जाएं ताकि उसके नेत्र-दान का सही इस्तेमाल हो सके। बड़ों से ज्यादा बच्चों में मुश्किल होती है। 

कई बार मोतियाबिंद आपरेशन के बाद मरीज में कुछ समस्याएं पैदा हो जाती हैं, जिस वजह से उन्हें कार्निया ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है। कई बार दूसरी बीमारियों जैसे- आंखों का संक्रमण, जन्मजात ग्लूकोमा वगैरह। ऐसी स्थिति में कार्निया ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है लेकिन आंखों से संबंधित कोई बीमारी भी हो, तो उसका इलाज भी साथ ही करना पड़ता है। कार्निया लगाने के लगभग एक से डेढ़ साल बाद मरीज अच्छी तरह देख पाता है। मरीज अपनी दिनचर्या के सारे काम आसानी से कर पाता है। लगभग 20 फीसद मामले ऐसे होते हैं, जिन्हें कार्निया मिलने के बाद भी उनका शरीर उन्हें अपना नहीं पाता। उनका इयून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता) इसे अपनाने से नकारता है। ऐसी स्थिति में मरीज अपनी देखने की क्षमता तक खो सकता है। मगर ऐसी स्थिति कम ही मरीजों में देखी जा सकती है। कार्निया लगने के बाद अगर दर्द बना रहे, आंखों में लालीपन रहे या देखेने मे दिक्कत हो तो तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करें ।