World Press Freedom Day: प्रेस की आज़ादी के मामले में फिसड्डी है भारत, जानिए क्यों ?

May 03 2021 01:00 AM
World Press Freedom Day: प्रेस की आज़ादी के मामले में फिसड्डी है भारत, जानिए क्यों ?

3 मई प्रेस की स्वतंत्रता दिवस, दुनिया भर की सरकारों के लिए एक रिमाइंडर के रूप में कार्य करता है, ताकि वो मीडिया की स्वतंत्रता को बनाए रखें। महत्वपूर्ण रूप से, विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मीडिया के लिए समर्थन का दिन है, जिसका लक्ष्य प्रेस स्वतंत्रता को बरक़रार रखना है। यह उन पत्रकारों के लिए भी याद करने का दिन है जिन्होंने एक कहानी की खोज में अपना जीवन खो दिया।  हर साल, 3 मई एक तारीख होती है, जो प्रेस की स्वतंत्रता के मूल सिद्धांतों का जश्न मनाती है, दुनिया भर में प्रेस की स्वतंत्रता का मूल्यांकन करने के लिए, मीडिया को उनकी स्वतंत्रता पर हो रहे हमलों से बचाने के लिए और उन पत्रकारों को श्रद्धांजलि देने के लिए, जिन्होंने अपने पेशेवर कार्य को करने की कवायद में दुनिया को अलविदा कह दिया । 1991 में UNESCO के महा सम्मेलन के छब्बीसवें सत्र में अपनाई गई एक सिफारिश के बाद 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस घोषित किया गया था। 3 मई 1991 को अफ्रीकी समाचार पत्रों के पत्रकारों द्वारा जारी किए गए विंड हॉक के घोषणापत्र की वर्षगांठ भी मनाई जाती है। यूनेस्को के संविधान के मूल में प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता शामिल है। यूनेस्को का मानना ​​है कि ये स्वतंत्रता एक स्थायी शांति बनाने के लिए आपसी समझ की अनुमति देती है। 

यह दुनिया भर के नागरिकों को प्रेस की स्वतंत्रता के उल्लंघन करने वालों के बारे में बताने का भी कार्य करता है, जैसे दुनिया भर के दर्जनों देशों में प्रकाशनों को बंद कर दिया जाता है, उन पर जुर्माना, निलंबन आदि की कार्रवाई होती है, साथ ही पत्रकारों, संपादकों और प्रकाशकों को प्रताड़ित किया जाता है, उन पर हमले किए जाते हैं, हिरासत में लिया जाता है और यहां तक ​​कि हत्या कर दी जाती है। दरअसल, मीडिया की आज़ादी के सीधे मायने हैं कि किसी भी व्यक्ति को अपनी राय कायम करने और सार्वजनिक तौर पर इसे प्रकट करने का पूरा-पूरा अधिकार है। इस स्वतंत्रता में बिना किसी दख़लंदाजी के अपनी राय कायम करने तथा किसी भी मीडिया के माध्यम से, चाहे वह देश की सीमाओं से बाहर का मीडिया हो, सूचना और विचार हासिल करने और सूचना देने की स्वतंत्रता शामिल है। इसका जिक्र मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के 'अनुछेद 19' में किया गया है। 'सूचना संचार प्रौद्योगिकी' तथा सोशल मीडिया के माध्यम से थोड़े समय के अंदर अधिक से अधिक लोगों तक सभी तरह की अहम ख़बरें पहुंच जाती हैं। यह समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि सोशल मीडिया की सक्रियता से इसका विरोध करने वालों को भी खुद को संगठित करने के लिए बढ़ावा मिला है और पूरी दुनिया के युवा लोग अपनी राय को प्रकट करने के लिए और व्यापक रूप से अपने समुदायों की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति के लिए संघर्ष करने लगे हैं। इसके साथ ही यह समझना भी ज़रूरी है कि मीडिया की स्वतंत्रता बेहद कमज़ोर है। यहां यह भी जानना ज़रूरी है कि अभी तक यह सभी लोगों की पहुंच से बाहर है। हालांकि मीडिया की सच्ची आज़ादी के लिए माहौल तैयार हो रहा है, किन्तु यह भी कड़वा सच है कि विश्व में कई लोग ऐसे हैं, जिनकी पहुंच बुनियादी संचार प्रौद्योगिकी तक नहीं है। जैसे-जैसे इंटरनेट पर ख़बरों और रिपोर्टिंग का सिलसिला बढ़ रहा है, ब्लॉग लेखकों, इंटरनेट पर लिखने वाले पत्रकारों को धमकियाँ दी जा रहीं है, यहां तक की उन पर हमले भी किये जा रहे हैं।

प्रेस की आज़ादी के मामले में क्या है भारत का स्थान :-

रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स द्वारा जारी की गई विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत को 180 देशों में 142वें स्थान पर रखा गया है। इस रिपोर्ट में देश में कम होती प्रेस की स्वतंत्रता के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) समर्थकों को ज़िम्मेदार करार देते हुए कहा गया है कि पार्टी समर्थकों ने मीडिया कर्मियों को डराने-धमकाने का माहौल बनाया है. साथ ही कई पत्रकारों की ख़बरों को ‘राष्ट्र विरोधी’ क़रार दिया है। वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2021 या 'विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2021' नामक इस सूची में नॉर्वे शीर्ष पर है, यानी नॉर्वे में मीडियकर्मियों को वो आज़ादी दी जाती है जो पूरी दुनिया में किसी को भी नहीं। वहीं मीडिया की आवाज़ को कुचलने के लिए कुख्यात चीन को इस रिपोर्ट में 177वां स्थान दिया गया है। तानशाह किम जोंग उन के नेतृत्व वाले उत्तर कोरिया को इस रिपोर्ट में 179वें स्थान मिला है। 

यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि, प्रेस की आज़ादी, अभिव्यक्ति की आज़ादी या बोलने की आज़ादी का यह मतलब कतई नहीं है कि व्यक्ति विष वमन करे। प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा गया है, इसलिए उसकी जिम्मेदारी और भी अधिक हो जाती है। अब अगर ऐसे में कोई पत्रकार या मीडिया संस्थान, देश विरोधी ताकतों के साथ मिलकर, तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करके, देश की संस्कृति या उसकी सम्प्रभुता के साथ खिलवाड़ करने की कोशिश करे, तो उसे मीडिया की आज़ादी कहकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। ये मीडिया की आज़ादी नहीं, बल्कि देश की आत्मा पर हमला है, क्योंकि देश के लोग वही देखते हैं, जो मीडिया कर्मी उन्हें दिखाते हैं और फिर उसी बुनियाद पर जनता के विचार भी विकसित होते हैं। ऐसे में अगर किसी ख़ास वर्ग या सियासी दल को खुश करने के लिए पत्रकारिता की जाती है, तो उस पर संज्ञान अवश्य लिया जाना चाहिए, क्योंकि आखिर में राष्ट्र से ऊपर कुछ भी नहीं होता है। 

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