मजदुर दिवस: बुनियादी जरूरतों को तरसती समाज की बुनियाद

हम मेहनतकश इस दुनिया से, जब अपना हिस्सा मांगेंगे
एक बाग़ नहीं, एक खेत नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे..

1983 में आई फिल्म मज़दूर का यह गीत आज के दौर में भी उतना ही सटीक बैठता है, जितना की उस समय हुआ करता था. आज 1 मई को हर साल अंतरराष्ट्रीय मजदुर दिवस मनाया जाता है, 1886 में इस दिवस को मानाने की शुरुआत अमेरिका के मजदूरों द्वारा की गई थी, उनकी मांग थी कि किसी भी मजदूर को 8 घंटे से ज्यादा काम न कराया जाए. भारत में इसकी शुरुआत  1 मई 1923 से हुई, उससे पहले इसे मद्रास दिवस के रूप में मनाया जाता था.

लेकिन आज 132 साल बाद भी समाज के बोझिल कार्यों को अपने खून-पसीने से तौलता यह मजदुर वर्ग उपेक्षा में जीने को मजबूर है, फिर चाहे वो फैक्ट्री में काम करने वाले मजदुर हों या सड़क किनारे खड़े दिहाड़ी मजदुर. आज, जबकि श्रमिकों के हितों में इतने संगठन बन गए हैं, इतनी संस्थाएं मजदूरों के हक़ में आवाज़ बुलंद करने लगी है, लेकिन इन संस्थाओं और संगठनों में राजनीति का विष मिल जाने के कारण, यहां भी मजदुर के लहू की कद्र नहीं है.

किसी महान विचारक ने कहा था, कि "मजदुर का पसीना सूखने से पूर्व उसका पारिश्रमिक उसे मिल जाना चाहिए", लेकिन आज मजदुर अपनी आँतड़ियों के झुलस जाने तक, दो वक़्त की रोटी के लिए अधिकारीयों के चक्कर लगाने को मजबूर है. समाज के इस बुनियादी ढांचे के लिए प्रशासन के पास भी वक़्त नहीं है, क्योंकि वहां तो एक-दूसरे के बयानों का जवाब देने में ही समय निकल जाता है. ऐसे में  मजदूरों को अब नए सिरे से संगठित होकर अपनी सामाजिक सुरक्षा और सम्मान के लिए फिर नई मजदूर क्रांति का सूत्रपात करने की जरुरत है. 

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