वैदिक परंपरा के प्रचारक और सनातन धर्म के रक्षक, जानिए आदि शंकराचार्य के बारे में ...

Apr 20 2019 06:00 AM
वैदिक परंपरा के प्रचारक और सनातन धर्म के रक्षक, जानिए आदि शंकराचार्य के बारे में ...

प्राचीन वैदिक परंपरा के विकास और सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार में आदि शंकराचार्य का बेहद महत्वपूर्ण योगदान है. उन्होंने वैदिक परंपरा को पूरे देश में प्रसारित करने के लिए भारत के चारों कोनों में चार मठों की स्थापना की थी. आज शंकराचार्य जयंती के अवसर पर हम आपको बताते हैं कि आदि गुरु शंकराचार्य ने ये शुरूआत कब और कैसे की थी और उनका जीवन कैसा था.

आदि शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के प्रणेता, संस्कृत के प्रख्यात विद्वान, उपनिषद व्याख्याता और वैदिक धर्म सुधारक थे. धार्मिक मान्यता में इन्हें भगवान शंकर का अवतार भी बताया गया है . इन्होंने करीब पूरे भारत की यात्रा की और इनके जीवन का अधिकतर भाग देश के उत्तरी हिस्से में बीता. प्राचीन भारतीय वैदिक परंपरा के विकास और सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार में आदि शंकराचार्य का बेहद अहम् योगदान है. इसके लिए उन्होंने भारत के चारों कोनों में चार मठों की स्थापना की थी. ये मठ ईसा से पूर्व आठवीं शताब्दी में स्थापित किए बताए जाते हैं. शंकराचार्य द्वारा स्थापित किए गए ये चारों मठ आज भी शंकराचार्यों के नेतृत्व में वैदिक परंपरा का प्रचार-प्रसार करते हैं.

आदि शंकराचार्य को अद्वैत परंपरा का प्रवर्तक कहा जाता है. शंकराचार्य को भारत के ही नहीं बल्कि विश्व के उच्चतम दार्शनिकों में शुमार किया गया है. उनके अद्वैत दर्शन को दर्शनों का दर्शन बताया जाता है. भारतीय धर्म दर्शन में भी इसे श्रेष्ठ माना गया है. उन्होंने वैदिक परंपरा पर अनेक ग्रन्थ भी लिखे हैं, किन्तु उनका दर्शन विशेष रूप से उनके तीन भाष्यों में जो - उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और गीता पर हैं, मुख्य है. गीता और ब्रह्मसूत्र पर अन्य आचार्यों के भी भाष्य हैं, किन्तु उपनिषदों पर समन्वयात्मक भाष्य जैसा शंकराचार्य का है, वैसा अन्य किसी का देखने को नहीं मिलता है.

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