जयंती विशेष: आज़ाद हिन्द फौज के सेनानायक रासबिहारी बोस

रास बिहारी बोस का जन्म 25 मई 1886 को पलरा-बिघाती (हुगली) देहातमें हुआ था, 1889 में जब उनकी माताजी की मृत्यु हुई, उस समय वे बहुत ही छोटे बच्चे थे, अत: उनकी मौसी वामा सुंदरी ने उनका पालन पोषण किया. रास बिहारी बोस की आरंभिक पढाई सुबालदाह में उनके दादाजी, कालीचरण की निगरानी में तथा महाविद्यालयीन शिक्षा डुप्लेक्स महाविद्यालय, चंदननगर में हुई. 1789  की फ्रेंच राज्य क्रांति ने रास बिहारी पर गहरा प्रभाव छोड़ा, रास बिहारी एकाग्रता से अध्ययन करने वाले छात्र नहीं थे, वे दिन में सपने देखते थे, क्रांति के विचारों से उनका दिमाग व्यस्त रहता था, पढ़ाई से अधिक वे अपनी शारीरिक क्षमता में रुचि रखते थे.

उन्होंने सुरेंद्रनाथ बॅनर्जी एवं स्वामी विवेकानंद इन वक्ता तथा क्रांतिकारियों के राष्ट्रवाद से परिपूर्ण भाषण पढ़े, चंदननगर में उनके विचारवंत गुरु चारुचंद मौलिक थे, जिन्होंने रास बिहारी को क्रांतिकारी विचारों से प्रेरित किया. 1905 के बंगाल विभाजन के पश्चात जो घटनाएं घटीं, उनसे प्रभावित होकर रास बिहारी पूरी तरह से क्रांतिकारी गतिविधियों में उलझ गए, वे इस निष्कर्ष तक पहुंचे कि जबतक देशभक्तों से कुछ क्रांतिकारी कार्यवाही नहीं होती, सरकार झुकेगी नहीं, जतिन बनर्जी के मार्गदर्शन में उनकी क्रांतिकारी गतिविधियां बढने लगीं.

23 दिसंबर 1912 के पश्चात रास बिहारी बोस अचानक प्रसिद्धि में आए, जब भारत के वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंके गए. ग़दर क्रांति भी रास बिहारी के नेतृत्व में ही ही इसके लिए विदेशों से विस्फोटक मंगवाए गए थे.  रास बिहारी तथा कप्तान मोहन सिंह एवं सरदार प्रीतम सिंहके प्रयासोंके कारण 1 सितंबर 1942 को भारतीय राष्ट्रीय सेनाकी स्थापना हुई, यही फ़ौज़ आज़ाद हिन्द फ़ौज़ कहलाई. दूसरा जागतिक महायुद्ध समाप्त होनेसे पूर्व, 21 जनवरी 1945 को टोकियो में रास बिहारी बोस की मृत्यु हो गई. तत्कालीन जापानी सरकार ने उन्हें एक विदेशी को दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान से नवाज़ा. इस महान क्रांतिकारी का पार्थिव शरीर लेने के लिए भारत से शाही गाड़ी भेजी गई, लेकिन अफ़सोस की भारत सरकार वहां से बोस का शव लाने में नाकाम रही. ऐसे जांबाज़ क्रन्तिकारी को शत-शत नमन.

पुण्यतिथि: एक निडर स्वतंत्रता सेनानी, बिपिन चंद्र पाल

 

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