अमिताभ की इन फिल्मों का अंत उनकी मौत से हुआ, जानिए सच

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन को हिंदी फिल्मों का शहंशाह यूँ ही नहीं कहा जाता है. अपनी हर फिल्म में अपने रोल को अनोखे अंदाज़ में निभाने के कारण वो उस किरदार को अमर बना देते है फिर चाहे वो अग्निपथ का "विजय दीनानाथ चौहान" हो या आनंद का "बाबू मोशाय". अपने आसपास करोड़ों लोगों में अपनी अलग छवि बनाने वाले अमिताभ के चाहने वाले दुनियाभर में मौजूद है पर कई बार यह खबर आयी है जिसने पुरे विश्व में उनके प्रशंसकों को 
झकझोंर दिया था तब जब उनकी मृत्यु की खबर सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी. 

 वैसे आनंद फिल्म में अमिताभ एक सहायक कलाकार के रूप में थे पर इस फिल्म में उनके द्वारा आनंद (राजेश खन्ना) की मौत पर बोला गया डायलॉग - "मौत तू एक कविता है... मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको... डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे... ज़र्द-सा चेहरा लिए चाँद उफ़क तक पहुंचे... दिन अभी पानी में हो रात किनारे के करीब... ना अँधेरा, ना उजाला हो... ना अभी रात, ना दिन... ज़िस्म जब ख़तम हो और रूह को जब सांस आये ... मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको " ने फिल्म जगत में उनकी कला की जो तस्वीर बनाई थी वो आज भी उसे मुकाम पर है. 

इसके अलावा भी अमिताभ की कुछ ऐसी फिल्में है जिसमे उनकी मृत्यु ने उस किरदार को अमर बना दिया जैसे - फिल्म शोले में "जय" ,फिल्म अग्निपथ में "विजय दीनानाथ चौहान" , फिल्म दीवार में "विजय" , फिल्म मुक्क़दर का सिकंदर में "सिकंदर" , फिल्म शक्ति में  "विजय" , फिल्म मैं आज़ाद हूँ में "आज़ाद" , आखिरी रास्ता में "बूढ़े अमिताभ के किरदार " और कुछ समय पहके आयी उनकी फिल्म पीकू में "भास्कर बनर्जी" के रूप में फिल्म में उनके मौत ने उनके किरदार को अमर बना दिया. 

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