अमेरिका में नज़र आती है भारत से अधिक सांप्रदायिकता

अमेरिका द्वारा हाल ही में एक रिपोर्ट पेश कर यह बताने का प्रयास किया गया कि भारत में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं हैं। यहां अल्पसंख्यकों के साथ हिंसात्मक व्यवहार किया जाता है। मगर अमेरिका की यह रिपोर्ट किसी साजिश से कम नज़र नहीं आती है। अमेरिका एक बार फिर भारत विरोधी रूख अपना रहा है। अमेरिका में राष्ट्रपति पद के चुनाव होने को हैं और व्हाईट हाउस में ओबामा के स्थान पर कोई और नेता काबिज होने की तैयारी में है।

ऐसे में यह माना जा रहा है कि अमेरिका की राजनीति भारत को अब उतना समर्थन न दे सके जितना ओबामा के कार्यकाल में मिला है। हालांकि यह रिपोर्ट अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में ही पेश की गई है। हालांकि अमेरिका के इस रूख को भारतीय के संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न होने के संवैधानिक अधिकार का हनन माना जा रहा है। 

हालांकि भारत में कुछ समय से सांप्रदायिक तनाव उपजा है लेकिन जो रिपोर्ट प्रस्तुत की गई है वह तत्काली यूपीए सरकार के कार्यकाल में उपजने वाले विवादों को लेकर है। उल्लेखनीय है कि यूपीए कांग्रेसनीत गठबंधन था जिसे सदैव से ही अल्पसंख्यकों का हितैषी कहा जाता है। मगर इस दौरान भी सांप्रदायिक तनाव देखने को मिला। हां, घर वापसी और धर्मांतरण जैसे मसले हिंदूवादी संगठनों द्वारा प्रारंभ किए गए। मगर यह बात भी उतनी ही सही है कि अमेरिका में भी सांप्रदायिकता का रंग देखने को मिला है। यहां मंदिरों पर होने वाले हमले और मंदिरों के बाहर आपत्तीजनक संदेश लिखे जाने के बाद विवाद गहरा गए।

यही नहीं एक 13 वर्षीय अश्वेत बच्चे ने हिंसा की परिस्थितियों को पैदा किया। अमेरिका में सिखों को पीटा गया। इसके अलावा भी कई ऐसी बाते हैं जो अमेरिका में सांप्रदायिक तनाव को दर्शाती हैं। भारत में अल्पसंख्यकों की जनसंख्या में विश्व की तुलना में बहुत अच्छी है। भारत का मुसलमान पढ़ लिखकर राष्ट्र के विकास में समान भागीदारी करता है और यहां उसे अच्छे अवसर दिए जाते हैं। मगर अमेरिका में वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के बाद से ही मुसलमानों को शक की नज़र से देखा जाने लगा है। आईएसआईएस के बढ़ते प्रभाव से दाढ़ी रखने वालों को सांप्रदायिकता का सामना भी करना पड़ता है। 

'लव गडकरी'

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