अंबेडकर जयंती: इस बार सभी दल क्यों है इतने गंभीर ?

देश की सभी राजनीतिक पार्टियां इस बार 14 अप्रैल को बाबा साहब की जयंती को लेकर बेहद गंभीर नज़र आ रही है. हाल ही में SC-ST act, आरक्षण के मुद्द्दे और देश भर में अंबेडकर की मूर्तियों को तोड़ने के सिलसिले को लेकर दलित वर्ग से सहानुभूति का ये मौका कोई भी छोड़ना चाहता. राजनीतिक दलों में बाबा साहब की जयंती मनाने की प्रतिस्पर्धा साफ़ देखी जा सकती है. जातिवादी राजनीति का हथियार बनाने वाली पार्टियों को दलितों की कम, दलित वोट बैंक की चिंता ज्यादा लगती है.

अपने जीवनकाल में जातिवाद के उन्मूलन के लिए काम करने वाले भीमराव आंबेडकर जातिवादी राजनीति के सबसे बड़े हथियार बना दिए गए हैं. आम चुनाव के मुहाने पर खड़े इस देश का हर राजनीतिक दल, बाबा साहब को अपने रंग में रंग देना चाहता है. इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण ये है कि तमाम राजनीतिक दलों और संगठनों में बाबा साहब की जयंति मनाने की होड़ मची हुई है.

इसी क्रम में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि डॉक्टर आंबेडकर को भाजपा ने जितना सम्मान दिया उतना किसी अन्य दल ने नहीं दिया. उन्होंने अपने सांसदों से कहा है कि आंबेडकर की जयंती के मौके पर 2 दिन दलित बस्तियों में रहें. इस निर्देश से भी समझा जा सकता है कि देश में दलित वोटों का कितना महत्व बढ़ गया है. खुद प्रधानमंत्री मोदी 13 अप्रैल को अलीपुर रोड में जनसभा को संबोधित करेंगे. इसी स्थान पर आंबेडकर का निधन हुआ है.

ताजा हालातों को देख कर बाबा साहेब की जयंती का महत्त्व बढ़ गया है. हर छोटा बड़ा नेता तैयारी में जुटा है और बाबा साहेब के बारे में बयान दे रहा है, जयंती को लेकर की जा रही तैयारी में अपने योगदान के बारे में उल्लेख करना भी नहीं भूल रहा है. ये और बात है की इनमे से ज्यादातर को शायद इसी साल मालूम पड़ा है कि 14 अप्रैल की तारीख के मायने क्या है.   

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