अलामा इकबाल की कलम से

तेरे इश्क़ की इन्तहा चाहता हूँ
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तेरे इश्क़ की इन्तहा चाहता हूँ
मेरी सादगी देख क्या चाहता हूँ

सितम हो कि हो वादा-ए-बेहिजाबी
कोई बात सब्र-आज़मा चाहता हूँ

ये जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों को
कि मैं आप का सामना चाहता हूँ

कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहल-ए-महफ़िल
चिराग़-ए-सहर हूँ, बुझा चाहता हूँ

भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी
बड़ा बे-अदब हूँ, सज़ा चाहता हूँ.

 

 


नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शनीदन दास्ताँ मेरी
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नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शनीदन दास्ताँ मेरी
ख़ामोशी गुफ़्तगू है, बेज़ुबानी है ज़बाँ मेरी


ये दस्तूर-ए-ज़बाँ-बंदी है कैसी तेरी महफ़िल में
यहाँ तो बात करने को तरस्ती है ज़बाँ मेरी


उठाये कुछ वरक़ लाला ने कुछ नरगिस ने कुछ गुल ने
चमन में हर तरफ़ बिखरी हुई है दास्ताँ मेरी


उड़ा ली कुमरियों ने तूतियों ने अंदलीबों ने
चमन वालों ने मिल कर लूट ली तर्ज़-ए-फ़ुगाँ मेरी


टपक ऐ शम आँसू बन के परवाने की आँखों से
सरापा दर्द हूँ हसरत भरी है दास्ताँ मेरी


इलाही फिर मज़ा क्या है यहाँ दुनिया में रहने का
हयात-ए-जाविदाँ मेरी न मर्ग-ए-नागहाँ मेरी.

 

 


मोहब्बत क जुनूँ बाक़ी नहीं है
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मोहब्बत क जुनूँ बाक़ी नहीं है
मुसलमानों में ख़ून बाक़ी नहीं है


सफ़ें कज, दिल परेशन, सज्दा बेज़ूक
के जज़बा-ए-अंद्रून बाक़ी नहीं है


रगों में लहू बाक़ी नहीं है
वो दिल, वो आवाज़ बाक़ी नहीं है


नमाज़-ओ-रोज़ा-ओ-क़ुर्बानी-ओ-हज
ये सब बाक़ी है तू बाक़ी नहीं है.

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